Tuesday, October 20, 2015

शाकाहार बनाम मांसाहार

नमस्ते मित्रो, 

वैसे तो ये लेख मैं सतीशचंद गुप्ता की पुस्तक के खंडन स्वरुप लिखता, मगर अभी कुछ दिनों से मांसाहार पर कुछ लोगो ने मनु महाराज, प्रभु श्री राम, महाराज दशरथ आदि अनेको महापुरषो पर लांछन लगाया, उन्हें माँसाहारी कहा। झूठे, बेबुनियाद और अप्रमाणिक ऐतिहासिक संदर्भ और मानव कानून (मनुस्मृति) के कुछ श्लोक पेश करके मांसाहार को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हुए विकृत मानसिकता का परिचय दिया।

कोई क्या खाए, क्या ना खाए ये व्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता है, मगर यहाँ ध्यान देने वाली बात है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वो जो खाए उससे समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। क्योंकि एक कहावत है "जैसा खाए अन्न वैसा होए मन" और ये कोई लोकोक्ति नहीं एक यथार्थ सत्य है। यदि मांसाहार बहुत उत्तम वस्तु होती, जो समाज में सदैव ही प्रचलित रही होती, खासकर भारतीय परिवेश में तो इस पर कभी भी शंका और सवाल नहीं उठ सकते थे, मान लीजिये आप यज्ञ और हवन करते हैं, तो ये भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है अतः इस विषय पर कभी कोई आक्षेप नहीं उठा, महिलाओ को आदर देना भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, इसपर कभी किसी ने आक्षेप नहीं किया, ऐसे अनेको क्रियाकलाप हैं, ऐसी अनेको सामाजिक गतिविधिया हैं जिनपर कभी किसी ने आक्षेप नहीं किया क्योंकि ये सनातन संस्कृति का अहम हिस्सा रही हैं। अब बात आती है मांसाहार की, यदि मांसाहार सनातन संस्कृति का हिस्सा रहा है तो इसपर आक्षेप क्यों लगाये जाते हैं ?

आक्षेप उन्ही संदिग्ध और विवादस्पद विषयो पर लगते हैं जो गलत, भ्रामक और निंदनीय होती हैं, जैसे सती प्रथा, भ्रूण हत्या, चाइल्ड मैरिज, गे रिलेशन, होमोसेक्सुअल्टी आदि। अब वो लोग जो सती प्रथा, भ्रूण हत्या, चाइल्ड मैरिज, गे रिलेशन, होमोसेक्सुँलिटी को प्रामाणिक और तार्किक मानते हैं, इनके लिए वो प्रमाण भी पेश करते हैं तो क्या इन्हे भी समाज में मान्यता दे दी जाए ? यदि किसी देश विशेष ने इन कुरीतियों को अपना रखा हो, मान्यता दे दी हो, तो क्या इस आधार पर ऐसी बुराइयो को समाज में अपना लिया जाए ? क्या ऐसी कुरीतियों पर तर्क, और प्रमाण देने पर भरोसा करा जा सकता है ?

नहीं, कदापि नहीं, क्योंकि जो लोग ऐसी कुरीतियों को मान्यता दे अथवा तर्क से सिद्ध करने की कोशिश करे उनको सभ्य समाज में कुतर्की और असभ्य ही कहा जाएगा, क्योंकि वो उसे सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं जो सिद्ध हो ही नहीं सकता, यदि सिद्ध हो सकता होता तो आज तक उसपर आक्षेप न लग रहे होते। यदि ये सिद्धांत और रीति सही होती तो आज समाज में मान्य होती, अमान्य नहीं करते। ऐसे ही कुछ तर्क और प्रमाण देकर कुछ मांसाहारी भ्रष्ट लोग मांस को भोज्य और गुणवत्ता वाला बता कर इसकी भूरि भूरि प्रशंसा करके लोगो को बहकाकर अपनी बात को सिद्ध करना चाहते हैं आइये एक नजर, धार्मिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण से डाल कर सोच विचार करते हैं :

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण : धर्म ये वो विषयवस्तु है जिसको ठीक ठीक विदित हो जाए तो वो जन्म मरण के चक्कर से छूटकर मोक्ष प्राप्त कर ले। मगर धर्म वो गूढ़ तत्त्व है जिसे समझना सबसे आसान कार्य भी है और सबसे मुश्किल भी, आसान उनके लिए जो मनुष्य हैं और मुश्किल उनके लिए जो मनुष्य रूप में भी पशु हैं, देखिये :

ईश्वर ने मनुष्य को सत्य ग्रहण करने की बुद्धि दी है, क्योंकि पशुओ में वो स्वाभाविक ज्ञान दिया है जो उनके लिए जरुरी है, लेकिन मनुष्यो में विवेक और स्वाध्याय का वो गुण दिया है जिससे मनुष्य मननशील होकर ज्ञान और विज्ञानं द्वारा नित नए आयाम प्राप्त करके समस्त मनुष्य और पशु पक्षी जाति का कल्याण कर सकता है, ये गुण पशुओ में नहीं देखे जाते इसीलिए मनुष्य पशुओ से श्रेष्ठ और उत्तम जाति है। लेकिन यही श्रेष्ठता और उत्तमता मनुष्य को पशु बनने की और भी प्रेरणा दे देती है, क्योंकि मनुष्य जब विवेक और स्वाध्याय को छोड़ कर मननशील नहीं रहता तब अपने दुर्व्यसन और उदर पूर्ति हेतु पापकर्म की और खींचा चला जाता है, तब ऐसी स्थति में अपनी वासनाओ और दुर्व्यसनों के चलते अपने पापकर्मों को सही सिद्ध करने हेतु तर्क और प्रमाण जुटाने लगता है। यही आकर मनुष्य, निकृष्ट और पशु योनि से भी निम्न स्तर पर चला जाता है, शायद इसीलिए धर्म शास्त्रो में स्थावर योनि का विधान है, क्योंकि स्थावर योनि ऐसी भोग्य योनि है जिसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, न उसे दर्द होता, न सोचने विचरने की क्षमता रहती, इसीकारण पेड़ पौधों में जीव होते हुए भी दर्द और सोचने विचरने की क्षमता नहीं पायी जाती, और जो मनुष्य मांसाहार करते हैं, अपने इस कुकृत्य को अपनी कपटी, थोति तर्क आधारित बातो से सही सिद्ध करने की कोशिश करते हैं वो मानो मनुष्य होते हुए भी स्थावर हैं, क्योंकि उनमे मननशीलता का गुण नहीं, वे कदापि मनुष्यता के लक्षण नहीं रखते अतः उन्हें मनुष्य कहलवाने का कोई अधिकार नहीं।

धार्मिक आधार और सैद्धांतिक तौर पर भोजन वो होना चाहिए जिससे न तो किसी का दोष लगा हो – ना पाप करके चोरी करके लाये हो – न ही हत्या अथवा हिंसा करके।

हिंसा कहते हैं – जो वैर भाव से किया गया कृत्य हो।” ऐसे में हमारे मस्तिष्क में सवाल उठता है आखिर फिर मनुष्य व पशु की भोजन व्यवस्था ईश्वर ने क्या दी है ? हमें क्या खाना चाहिए ?

ईश्वर की न्याय व्यवस्था में एक नियम है, ईश्वर ने मनुष्य और पशु बनाये तो उनकी खाद्य सामग्री भी अवश्य ही बनाई होगी। अतः हम आगे पढ़ेंगे की मनुष्य और पशु की खाद्य सामग्री क्या है। आइये देखिये

मांसाहारी पशु और शाकाहारी पशु तथा मनुष्य, इन सभी का निर्माण ईश्वरीय न्यायवेवस्था से होता है, जो पशु मर जाते हैं उनका मांस सड़कर प्रकृति में बिगाड़ पैदा करता है इसलिए वो बिगड़ पैदा न हो प्रकृति दूषित न हो इसलिए मांसाहारी पशुओ का सृजन होता है जैसे गिद्ध, चील, कौव्वा आदि।

कुछ पशु अपना पेट भरने हेतु हिंसक गतिविधि करते हु शिकार करते हैं यथा शेर, चीता, जंगली कुत्ता, लोमड़ी आदि इनमे प्रमुख हैं, अधिकतर मांसाहारी मनुष्य इन्ही पशुओ का दृष्टान्त देते हुए कहते हैं देखिये यदि मांसाहार ठीक नहीं होता तो ईश्वर मांसाहारी पशु नहीं बनाता, लेकिन इस कुतर्क के पीछे का ज्ञान कभी नहीं समझते, ईश्वर ने माँसाहारी पशुओ को हिंसक ही बनाया है और वो हिंसा करके ही अपना भोजन प्राप्त करते हैं, ये सर्वमान्य तथ्य है, तो क्या मांसाहारी मनुष्य ये बात स्वीकार करते हैं की वे भी हिंसक, जंगली और हिंसा करके ही उदार पूर्ति करते हैं ? ये सवाल पूछते ही वो कहते हैं नहीं हम तो अहिंसक है, मनुष्य हैं। भाई वाह ! कार्य करते हो जंगली और पशुता वाले, कहते हो खुद को मनुष्य ? आइये आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हैं, देखिये :

वैज्ञानिक दृष्टिकोण : सात्विक भोजन से न्यूरो इनहीबीटरी ट्रान्समीटर्स उत्पन्न होते हैं, जिनसे मस्तिष्क शांत रहता है। वहीं असात्विक (मॉस) भोजन से मस्तिष्क में उत्तेजक तंत्रिका संचारक (न्यूरो इक्साइटेटरी ट्रान्समीटर्स) उत्पन्न होते हैं जिससे मस्तिष्क अशांत रहता है। गाय, बकरी, भेड़ आदि शाकाहारी जन्तुओं में सिरोटोगिन की अधिकता के कारण ही उनमें शांत प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं जबकि माँसाहारी जन्तुओं जैसे शेर आदि में सिरोटोनिन के अभाव से उनमें अधिक उत्तेजना, अशांति एवं चंचलता पायी जाती है। इसी परिप्रेक्ष्य में सन् 1993 में जर्नल ऑफ क्रिमिनल जस्टिक एज्युकेशन में फ्लोरिडा स्टेट के अपराध विज्ञानी सी.रे.जैफरी का वक्तव्य भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह चाहे कोई भी हो, मस्तिष्क में सिरोटोनिन का स्तर कम होते ही व्यक्ति आक्रामक और क्रूर हो जाता है। शिकागो ट्रिब्यून में प्रकाशित अग्रलेख भी बताता है कि मस्तिष्क में सिरोटोनिन की मात्रा में गिरावट आते ही हिंसक प्रवृत्ति में उफान आता है।

यहाँ यह बताना उचित होगा कि मॉस से जिनमें ट्रिप्टोपेन नामक अमीनों अम्ल नहीं होता है, मस्तिष्क में सिरोटोनिन की कमी हो जाती है एवं उत्तेजक तंत्रिका संचारकों की वृद्धि हो जाती है। इसी से योरोप के विभिन्न उन्नत देशों में नींद ना आने का एक प्रमुख कारण वहाँ के लोगों को माँसाहारी होना भी हैं उपरोक्त सिरोटोनिन एवं अन्य तंत्रिका संचारकों की क्रिया विधि पर काम करने से श्री पॉल ग्रीन गार्ड को सन् 2000 का नोबल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।

अतः विज्ञानं भी मानता है की मांस भक्षण से मनुष्य में क्रूरता, हिंसा और अपराध करने की प्रवृति जागती है, इसीलिए इस मांस भोजन को तामसी भोजन कहा जाता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है की पशुओ में तो मननशील स्वाभाव नहीं होता इसलिए पशुता निभाते हुए, अपने कर्मफल भोग करके हिंसा द्वारा मांसाहारी होते हैं, लेकिन मनुष्य जिसका कर्तव्य ही मनुष्यता है क्या वो ऐसी हिंसा करके अपना भोजन करे तो उसे मनुष्य कहा जा सकता है ?

मांसाहारी मनुष्यो का दूसरा कुतर्क होता है पेड़ पौधों में जीव होता है, जिससे उन्हें भी दर्द होता है, यहाँ तक की पशु तो चीखचिल्ला कर अपना दर्द प्रकट करते हुए जिबह (मरते) हैं। लेकिन बेचारे पेड़ पौधे तो ऐसा भी नहीं कर सकते, उनकी चीख तो सुनाई भी नहीं देती, ये बड़ा अपराध है।

अब देखिये कुतर्क, जिन पशुओ की चीख, दर्द, चिल्लाहट प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे उनपर दया का रत्ती भर प्रभाव नहीं, लेकिन जो पेड़ पौधों की चीख तक सुनाई नहीं देती उनपर दया और रहम की पट्टी बंधने को तैयार हैं। खैर इनके कुतर्क का जवाब देना हमारी जिम्मेदारी है, देखिये एक भारतीय वैज्ञानिक हुए थे जगदीश बासु जी, जिन्होंने ऐसा कोई तथाकथित विज्ञानिक यंत्र ईजाद किया था जिससे पेड़ पौधों की चीख सुनाई देती थी, लेकिन हम आधुनिक विज्ञानं में जी रहे हैं भाइयो, आधुनिक विज्ञानं के अनुसार, न तो पेड़ पौधों को दर्द होता है, न ही उन्हें कुछ महसूस होता है क्योंकि दर्द की अनुभूति और कुछ भी महसूस करने हेतु बुद्धि और नर्वस सिस्टम होना जरुरी है मगर पेड़ पौधों में ये नहीं पाया जाते (Bhalla, US; Iyengar, R (1999). "Emergent properties of networks of biological signaling pathways". Science 283 (5400): 381–7)

ऐसी अनेको रिसर्च से आधुनिक विज्ञानं का पिटारा भरा हुआ है जो सिद्ध करता है की पेड़ पौधों में बुद्धि और नर्वस सिस्टम नहीं होता इसलिए उन्हें दर्द की अनुभूति नहीं हो सकती। लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात है की पेड़ पौधे सजीव होते हैं, जैसे आज मांसाहारी स्थावर हो चुके हैं उन्हें पशुओ का दर्द और पीड़ा आदि कुछ नहीं सूझ रहा ऐसे ही वो पेड़ पौधों में भी ईश्वरीय व्यवस्था से यही गुण दे दिए जाते हैं अतः मांसाहारी मनुष्य अगले जन्म में स्थावर या फिर हिंसक पशु उत्पन्न होंगे इसमें कोई शक नहीं। वैसे भी इस जन्म में मांसाहारी मनुष्य हिंसक और स्थावर तो हैं ही अतः ये भी अतिश्योक्ति नहीं की ये पेड़ पौधों व मांसाहारी पशुओ से मनुष्य श्रेणी में आये हो इसलिए ये गुण पाये जाते हो।

प्राकृतिक दृष्टिकोण : विगत कुछ वर्षों से विश्वव्यापी खाद्यान्न समस्या चर्चा का विषय बनी हुयी है। इस समस्या का समाधान निम्नांकित वैज्ञानिक तथ्य करके दिखाते हैं :— (अ) एक किलोग्राम जन्तु प्रोटीन (माँस) हेतु लगभग ८ किलोग्राम वनस्पति प्रोटीन की आवश्यकता होती है। सीधे वनस्पति उत्पादों का उपयोग करने पर माँसाहार की तुलना में सात गुना व्यक्तियों को पोषण प्रदान किया जा सकता है।

(आ) किसी खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोषक स्तर पर ९० प्रतिशत ऊर्जा का खर्च होकर मात्र १० प्रतिशत ऊर्जा ही अगले पोषक स्तर पर पहुँच पाती है। पादप प्लवक, जन्तु प्लवक आदि से होते हुए मछली तक आने में ऊर्जा का बड़ा भाग नष्ट हो जाता है और ऐसे में एक चिंताजनक तथ्य यह है कि विश्व में पकड़ी जाने वाली मछलियों का चौथाई भाग माँस उत्पादक जानवरों को खिला दिया जाता है।

(इ) समुद्र की खाद्य श्रंखला को देखने पर पता चलता है कि वहाँ पादप प्लवकों द्वारा संचित 31080 खरब ऊर्जा बड़ी मछली तक आते—आते मात्र 126 खरब बचती है। समुद्री शैवालों का विश्व में र्वािषक जल संवर्धन उत्पादन लगभग ६.र्५ १००, ००,००० टन है। जापान तथा प्रायद्वीपों सहित दूरस्थ पूर्वी देशों में इसके अधिकांश भाग का सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। समुद्री घासों में प्रोटीन काफी मात्रा में पायी जाती है। इसमें पाये जाने वाले एमीनो अम्ल की तुलना सोयाबीन या अण्डा से की गयी है। अतएव मछली पालन के स्थान पर पादप प्लवक पल्लवन से अहिंसा , ऊर्जा एवं धन तीनों का संरक्षण किया जा सकता है।
(ई) विश्व में प्रतिवर्ष २० लाख लोग कीटानाशी विषाक्तता से ग्रसित हो जाते हैं, जिनमें से लगभग २० हजार की मृत्यु हो जाती है। कीटनाशक जहर जैसे होते हैं और ये खाद्य शृंखला में लगातार संग्रहीत होकर बढ़ते जाते हैं। इस प्रक्रिया को जैव आवर्धन कहते हैं। उदाहरण के लिये प्रातिबंधित कीटनाशक डी. डी. टी. की मात्रा मछली में अपने परिवेश की तुलना में १० लाख गुना अधिक हो सकती है और इन मछलियों को खाने वालों का स्वाभाविक रूप से अत्यधिक जहर की मात्रा निगलनी ही पड़ेगी।
यही प्रक्रिया अन्य माँस उत्पादों के साथ भी लागू होती है। कीटनाशकों, रसायनों से मुक्त आधुनिक जैविक कृषि आज सारे विश्व का ध्यान आर्किषत कर रही है। इसके अलावा वृक्ष खेती तथा मशरूम खेती भी खाद्यान्न समस्या के शानदार समाधान है।

विश्व के करीब १.२ अरब व्यक्ति साफ पानी (पीने योग्य) के अभाव में जी रहे हैं। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि वर्ष २०२५ तक विश्व की करीब दो तिहाई आबादी पानी की समस्या से त्रस्त होगी। विश्व के ८० देशों में पानी की कमी है। इस समस्या के संदर्भ में जहाँ १ किलोग्राम गेहूँ के लिये मात्र ९०० लीटर जल खर्च होता है वहीं गोमाँस के उत्पादन में १ लाख लीटर जल खर्च होता है। इस तथ्य से जल समस्या का समाधान भी शाकाहार में दिखायी देता है।

मानव मस्तिष्क में हुयी सबसे बड़ी वृद्धि का कारण हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रिचर्ड रेंधम और नेन्सील कांकलिन ब्रिटेन तथा मिनेसोटा विश्वविद्यालय के ग्रेग लेडन के अनुसार पका हुआ शाकाहारी भोजन है। अतः प्राकृतिक दृष्टिकोण से भी मांसाहार अनुचित है।

मांसाहार से सम्बंधित कुछ अन्य विचार : विश्व स्वास्थ्य संगठन की बुलेटिन संख्या ६३७ के अनुसार माँस खाने से शरीर में लगभग १६० बीमारियाँ प्रविष्ट होती हैं। अधिकांश औषधियाँ वनस्पतियों से ही प्राप्त होती है।

कैंसर—अमरीकी वैज्ञानिकों की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार यदि लोग अधिक भुने हुये माँस तथा सड़ी चर्बी न खाये तो उन्हें कैंसर होने की आशंका बहुत कम रहेगी। इंटरनेशनल एजेन्सी ऑफ रिसर्च ऑन कैंसर के निर्देशक पॉल क्लीहाज के अनुसार पश्चिमी देशों में १० में से १ मरीज फल और सब्जी नहीं खाने की वजह से इस बीमारी की चपेट में आता है। केलिर्फोिनया विश्वविद्यालय के जीव रसायन विभाग के अध्यक्ष श्री ब्रूस एन एम्स ने बताया कि भोजन पकाने की प्रक्रिया में खाद्य तेल और चर्बी गोश्त में विकृति बढ़ाते हैं जिससे इनके सेवन में कुछ ऐसी विकृत स्थितियाँ बनती हैं जिनसे आनुवांशिकी द्रव्य क्षतिग्रस्त होते हैं और शरीर में कैंसर होने की आशंका बढ़ जाती है। संतरे के रस और हरी सब्जियाँ में फोलेट नामक तत्व होता है जो स्तन कैंसर के खतरों को कम करता है। प्रमुख कैंसर रोधी औषधियाँ इविंनग प्राइमरोज के बीज, लंदूसी नामक बूटी की पत्तियों का सलाद इत्यादि शाक पात हैं।

शाकाहार से सम्बंधित कुछ अन्य विचार : हरी सब्जियों में उपस्थित पोषक तत्व तथा विटामिन ई एवं सी प्रति ऑक्सीकारकों की तरह कार्य करते हैं। अल्जाइमर रोग से बचाने में इन प्रति आक्सीकारकों की ही भूमिका होती है, शरीर से मुक्त मूलकों की सफाई में प्रति आक्सीकारक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुक्त मूलक कैंसर सहित अनेक घातक रोगों के लिये उत्तरदायी होते हैं।

टी. बी. हमारी सफेद रक्त कोशिकाओं एवं रोगाणु का पेगोसोम बंद करवाती है फिर इसे लाइसोसोम के संपर्क में लाकर नष्ट करवा देती है परन्तु टी.बी. का कीटाणु पेगोसोम को लाइसोसोम से जुड़ने नहीं देता है और अंदर बैठा—बैठा बढ़ता रहता है।
यूरोपियन मालिक्यूलर बायोलॉजिकल रिसर्च सोसायटी जर्मनी के एक अनुसंधान के अनुसार वनस्पति तेलों में पाई जाने वाली वसाएँ एरेचिडोनिक अम्ल और सेरेमाइड पेगोसोम को लाइसोसोम से जुड़ने नहीं देता है और अंदर बैठा—बैठा बढ़ता रहता है।

यूरोपियन मालिक्यूलर बायोलॉजिकल रिसर्च सोसायटी जर्मनी के एक अनुसंधान के अनुसार वनस्पति तेलों में पाई जाने वाली वसाएँ एरेचिडोनिक अम्ल और सेरेमाइड पेगोसोम को लाइसोसोम से जोड़ने में मदद करती हैं जबकि मछली के तेल में पाई जाने वाली वसाएँ इस क्रिया में बाधक होती हैं। अर्थात् शाकाहार टी. बी. को रोकता है जबकि माँसाहार इस मारक रोग को बढ़ाता है। इस शोध के प्रमुख गेरेथ ग्रिफिथ्स के अनुसार शायद इसीलिए खूब मछली खाने वाले इनुइट लोग टी. बी. से जल्दी ग्रसित हो जाते हैं। इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यान देने योग्य हैं कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग ५ लाख लोग टी. बी. से मर रहे हैं।

वेदादि सत्य आर्ष ग्रंथो और ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है की आर्य जाती पूर्णतया शाकाहारी है देखिये

कात्यान्न श्रोतसूत्र मे आया है-
दुष्टस्य हविषोSप्सवहरणम् ।।२५ ,११५ ।।
उक्तो व मस्मनि ।।२५,११६ ।।
शिष्टभक्षप्रतिषिध्द दुष्टम।।२५,११७ ।।
अर्थात होमद्र्व्य यदि दुष्ट हो तो उसे जल मे फेक देना चाहिए उससे हवन नहीं करना चाहिए ,शिष्ट पुरुषो द्वारा निषिध मांस आदि अभक्ष्य वस्तुयें दुष्ट कहलाती है ।

शतपत में मॉस भोजी को यज्ञ का अधिकार नही दिया है देखिये :-
"न मॉसमश्रीयात् ,यन्मासमश्रीयात्,यन्मिप्रानमुपेथादिति नेत्वेवैषा दीक्षा ।"(श. ६:२ )
अर्थात मनुष्य मॉस भक्षण न करे , यदि मॉस भक्षण करता है अथवा व्यभिचार करता है तो यज्ञ दीक्षा का अधिकारी नही है

मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोक देकर अपने मांसभक्षण को सही सिद्ध करने वालो की ऐसा मालूम होता है इन लोगो की बुद्धि कहीं घास चरने चली गयी है, अन्यथा वे ऐसा कभी न कहते क्योंकि देखिये मनु महाराज ने “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” का क्या अर्थ दिया है –

या वेदविहिता हिंसा, नियतास्मिंश्चराचरे। अहिंसामेव तां विद्याद्, वेदाद धर्मो हि निर्बभौ।। योहिंसकानि भूतानि, हिनस्त्यात्मसुखेच्छया। स जीवंश्च मृत्श्चैव, न कश्चित् सुखमेधते।। (५.४४-४५)

अर्थात, जो विश्व संसार में दुष्टो – अत्याचारियो – क्रूरो – पापियो को जो दंड – दान रूप हिंसा वेदविहित होने से नियत है, उसे अहिंसा ही समझना चाहिए, क्योंकि वेद से ही यथार्थ धर्म का प्रकाश होता है। परन्तु इसके विपरीत जो निहत्थे, निरपराध अहिंसक प्राणियों को अपने सुख की इच्छा से मारता है, वह जीता हुआ और मरा हुआ, दोनों अवस्थाओ में कहीं भी सुख को नहीं पाता। दुष्टो को दंड देना हिंसा नहीं प्रत्युत अहिंसा होने से पुण्य है, अतएव मनु ने (8.351) में लिखा है –

गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन।। नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवती कश्चन। प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति।।

अर्थात, चाहे गुरु हो, चाहे पुत्र आदि बालक हो, चाहे पिता आदि वृद्ध हो, और चाहे बड़ा भरी शास्त्री ब्राह्मण भी क्यों न हो, परन्तु यदि वह आततायी हो और घात-पात के लिए आता हो, तो उसे बिना विचार तत्क्षण मार डालना चाहिए। क्योंकि प्रत्यक्षरूप में सामने होकर व अप्रत्यक्षरूप में लुक-छिप कर आततायी को मारने में, मारने वाले का कोई दोष नहीं होता क्योंकि क्रोध को क्रोध से मारना मानो क्रोध की क्रोध से लड़ाई है।

““यज्ञ में हिंसा की निंदा और अहिंसा की प्रशंसा”

ये वृतांत महाभारत में शांतिपर्व के अंतर्गत अध्याय २७२ में आता है – केवल इतना ही नहीं – यहाँ ये भी बताया गया है की यदि कोई यज्ञ में पशु वध करता है – तो निश्चय ही उसका सब तप नष्ट हो गया।

तस्य तेनानुभावेन मृगहिसात्मनस्तदा।
तपो महत समुच्छिन्नं, तस्माद्धहिंसा न यज्ञिया।।
अहिंसा सकलो धर्मोहिंसा धर्मस्तथाविधः।
सत्यंतेहं प्रवक्ष्यामि, यो धर्मः सत्यवादिनाम्।।

इस प्रकरण में महाराज युधिष्ठर ने भीष्म पितामह से पूछा है की धर्म तथा सुख के लिए यज्ञ कैसा करना चाहिए ? उसके उत्तर में पितामह ने एक तपस्वी ब्राह्मण -ब्राह्मणी दंपत्ति का वृतांत देते हुए बतलाया है की किसप्रकार उस तपस्वी ब्राह्मण का महान तप, यज्ञ में पशुबलि देने के लिए एक वन्य मृग को मारने की इच्छा मात्र से विनष्ट हो गया। इसलिए यज्ञ में कभी हिंसा न करनी चाहिए। अहिंसा सार्वत्रिक और सारकालिक नित्य धर्म है। इस प्रमाण से ज्ञात होता है की न तो महाभारत काल में यज्ञ में पशु हिंसा का विधान था – न ही उससे पहले के काल में क्योंकि अथर्ववेद 11.7.7 में लिखा है –

राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः।
अकार्श्वमेधावुच्छिष्टे जीव बर्हिममन्दितमः।।

राजसूय, वाजपेय, अग्निष्टोम, अर्कमेध, अश्वमेध आदि सब अध्वर अर्थात हिंसा रहित यज्ञ हैं, जोकि प्राणिमात्र की बुद्धि करने वाला और सुख शांति देने वाला है। एवं इस मन्त्र में राजसूय आदि सभी यज्ञो को “अघ्वर” कहा गया है जिसका एकमात्र सर्वसम्मत अर्थ “हिंसा रहित यज्ञ है” जोकि निषेधार्थक नञ पूर्वक ‘ध्वर’ हिंसायां धातु से बनता है। घ्वरो हिंसा तदभावोत्र सोध्वरः। अतः स्पष्ट है की वेदने किसी भी यज्ञ में पशुवध की आज्ञा नहीं दी, उल्टा पशुवध करने पर उसे यज्ञ ही नहीं माना। इसलिए वेद के नाम पर यज्ञो में पशुवध करना अपने को धोखा देना है, दुसरो को उल्टा रास्ता बतलाना, अथवा अपनी अज्ञानता प्रकट करना है। फिर यह भी देखिये की पशु वध करने पर प्राणिमात्र की क्या वृद्धि हुई और उसे क्या सुख शांति मिली, उल्टा प्राणी की हत्या करते समय उसे घोर यातना दी जाती है और उसका जीवन तक समाप्त कर दिया जाता है, तब वह कर्म “बर्हिममन्दितमः” कैसे रहा ?”

उपरोक्त मनु स्मृति के प्रमाण से भी स्पष्ट है की यज्ञ में पशु वध का निषेध है। वेद प्रमाणों से स्पष्ट है की वेदो में पशु वध निषेध है – जबकि वेदो में पशुओ को पालने का स्पष्ट निर्देश है – यहाँ तक की – गाय, घोड़ा आदि पशुओ की हत्या करने वालो को “प्राणदंड” तक का विधान है – मनु स्मृति भी इस बात की पुष्टि करती है – ब्राह्मण ग्रन्थ भी यही कहते हैं = महाभारत भी यही कहती है – तो इससे सिद्ध है – न तो वैदिक काल में यज्ञ में पशु वध होता था – ना ही महाभारत काल में – ये सब महाभारत युद्ध के ५००-१००० वर्ष बाद की उपज ही सिद्ध होती है –

मैं उन सभी बंधुओ को इस माध्यम से सूचित करना चाहता हु, जब वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, इतिहास, और मानवशास्त्र धर्मग्रन्थ आदि भी मांसाहार को पाप कर्म बताते हैं तब हमारे इतिहास के श्री राम आदि महापुरष किस प्रकार माँसाहारी हो सकते हैं ?

जो भी मनुस्मृति में मांसाहार सम्बंधित श्लोक हैं वे प्रक्षिप्त हैं क्योंकि महाभारत का श्लोक ऊपर दिया है, जिसमे इसी विषय पर संकेत किया गया है।

अतः सत्य सनातन वैदिक स्वरुप को पहचानिये, शाकाहार अपनाये, बीमारी दूर भगाए, शुद्ध सात्विक और सनातन संस्कृति हमारी पहचान

लौटो वेदो की और

नमस्ते

सतीश चंद गुप्ता द्वारा उठाये (4 पिछले पोस्ट के साथ) पहले अध्याय का जवाब पार्ट 5 (B)

गत पोस्ट से आगे, शब्दों की समय सीमा के कारण पोस्ट में २ पॉइंट छूट गए जिनको यहाँ दिया जाता है। 

5. मनुष्य और पशु आदि में जीव एक सा है। (९:७४)

समीक्षा : वैसे तो समीक्षक की हास्यास्पद बात पर अनेको तथ्य इसी पॉइंट में लिखे जा सकते हैं, मगर इसी विषय से सम्बंधित एक अध्याय भी है "मरणोत्तर जीवन - तथ्य और सत्य" समुचित व्याख्या उस अध्याय में की जाएगी, यहाँ केवल संक्षेप में समझाने की कोशिश करते हैं, जो भी चेतन शक्ति हैं उनमे विज्ञानिक दृष्टिकोण से इन्द्रियों का समावेश होता है, जिन चेतन सत्ताओ में इन्द्रियां पायी जाती हैं उनमे जीव होता है, इसलिए उन्हें सजीव कहा जाता है, क्योंकि इन्द्रिया जीव के सूक्ष्म शरीर का हिस्सा है ये आध्यात्मिक दृष्टिकोण है अतः इस पर समुचित व्याख्या सम्बंधित विषय में करेंगे यहाँ केवल इतना समझते हैं की चाहे मनुष्य हो या पशु इनके शरीर में जीव रहता है तब तक शरीर कार्य करता है। इन्दिर्यो का सुचारू रूप से कार्य करना स्वस्थ शरीर की निशानी है। जैसे जैसे शरीर कमजोर होता जाता है उसमे इन्द्रियों को धारण करने की शक्ति क्षीण होती जाती है और जब शरीर इन्द्रियों को धारण करने की अवस्था में बिलकुल भी नहीं रहता तब जीव (आत्मा और सूक्ष्म शरीर) इस भौतिक शरीर का त्याग कर एक नए शरीर अर्थात पुनर्जन्म धारण करती है। इसे ही मृत्यु और जीवन का निरंतर चक्र अथवा प्रक्रिया कहा जाता है। अब यदि समीक्षक अति विद्वान और वैज्ञानिक है तो जैसा क़ुरान बताती है उसके आधार पर तो पशु में जीव (आत्मा) नहीं की थ्योरी मानने वाले कृपया बताये की पशु मर क्यों जाता है ? जिस शरीर में जीव होगा वह शरीर संयोग और वियोग करेगा पशु और मनुष्य में केवल यही समानता ही नहीं और भी अनेको समानताये पायी जाती हैं, पशु में भी वही इन्द्रियाँ हैं जो मनुष्य में हैं, आँख (देखना) कान (सुनना) नाक (सूंघना) त्वचा (स्पर्श) जीभ (स्वाद ग्रहण करना), रक्त, हड्डी, नस, नाड़ी इत्यादि अनेको शरीर में विद्यमान प्रक्रिया जो मनुष्यो में भी होती हैं, इनके अतिरिक्त आहार लेना, निद्रा, मैथुन आदि द्वारा संतानोत्पत्ति करना, संतान का रक्षण और उसे शिकार आदि करने की शिक्षा देना जैसे मानो मनुष्य अपने संतान को शिक्षा आदि ग्रहण करवाने को गुरु, विद्यालय आदि भेजते हैं सब कुछ वही प्रक्रिया जो मनुष्य में पायी जाती है वही पशुओ में भी यहाँ तक की दोनों ही शरीरो का जीवन और मृत्यु से भी संबंध है क्योंकि दोनों ही मनुष्य और पशु मृत्यु के गाल में समाते ही हैं।

हाँ ये सत्य है की मनुष्यो में बुद्धि का जो गुण परमपिता परमात्मा ने दिया है वो पशुओ के पास वैसी बुद्धि नहीं दी क्योंकि ईश्वर ने पशु पक्षियों को स्वाभाविक ही वो ज्ञान दिया है जो उनके लिए जरुरी है जैसे मगरमच्छ का बच्चा अंडे से निकलते ही तैराकी के गुण जानता है, पक्षियों के बच्चे उड़ने का गुण लिए पैदा होते हैं, ठीक वैसे ही मनुष्य की संतान उत्पन्न होते ही दूध पीने आदि गुणों से संयुक्त उत्पन्न होती है क्योंकि ये व्यवस्था ईश्वर की है, मगर मनुष्य में सोचने और समझने की बुद्धि ईश्वर ने इसीलिए दी ताकि मनुष्य परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष ग्रहण कर सके। ईश्वर ने बुद्धि केवल इसलिए नहीं दी की नाहक ही पशुओ को मारकर उनका खून बहकर अपनी क्षुधा शांत करे, इस विषय पर सम्बंधित विषय में लिखेंगे।

कुरान में अल्लाह मियां ने स्पष्ट कर दिया है की मनुष्यो को अन्य जीवित प्राणियों का खलीफा बनाकर पृथ्वी पर भेजा जा रहा है यानी कुरान इस बात का पूर्णतया समर्थन करता है की मनुष्य को अन्य पशु पक्षियों की सत्ता पर अधिकार देकर खलीफा बना कर भेजा गया (कुरान 2:31) अब सोचने की बात है, क्या खलीफा (अधिनायक) सत्ताधारी पक्ष, केवल बेजुबान पशु पक्षियों पर अत्याचार करके, उन्हें मारकर उनका मांस खाने वाला बन कर अपनी सत्ता का गलत और नाजायज़ फायदा नहीं उठा रहा ? क्या ऐसे अत्याचारी और हत्यारे को खलीफा (अधिनायक) घोषित किया जा सकता है ? शायद यही वजह थी की अल्लाह के पास मौजूद अनेको फरिश्तो ने भी इस कार्य के लिए अल्लाह को चेताया था (क़ुरान 2:31) क्या अब भी ये बताने की जरुरत है की खलीफा (अधिनायक) का दायित्व है बेजुबान पशु पक्षियों की रक्षा करना ना की उन्हें अपनी जीभ के स्वाद लेने हेतु हत्या कर खा जाना। आइये क़ुरान से ही स्पष्ट करते हैं की मनुष्य और पशु पक्षी आदि में एक ही जीव है वैसे तो इस विषय को पहले भी बताया जा चूका है मगर एक बार पुनः देखिये :

फिर जब उन्होंने उन बातो से रुकने की अपेक्षा जिन से उन्हें रोका गया था और भी आगे बढ़ना शुरू किया तो हमने उन्हें कहा की तुच्छ (जलील) बंदर बन जाओ।

(क़ुरान ७:१६७)

समीक्षक के अनुसार यदि कुरान में पशु पक्षी में आत्मा (जीव) का होना नहीं पाया जाता तो जो ये समंदर के पास रहने वाली बस्ती के मनुष्यो को बन्दर बनाने की बात क़ुरान में अल्लाह ने बताई ये मिथ्या है ? क्या ये कोई विशिष्ट प्रकार के बन्दर थे जिनमे मनुष्य जैसा ही जीव था अथवा कोई सामान्य बन्दर थे ? समीक्षक को कुरान पढ़ने पर ये भी ज्ञात होगा की कुरान में ही अनेको जगह मनुष्य और पशु पक्षियों यहाँ तक की जितनी भी जीवित सत्ताएं पृथ्वी पर पायी जाती हैं सब की सब पानी से ही बनी है देखिये :

हमने पानी के द्वारा प्रत्येक सजीव को जीवन प्रदान किया है।

(क़ुरान २१:३१)

मैं तुम्हारे भले के लिए गीली मिटटी का स्वाभाव रखने वालो (अर्थात विनम्र स्वाभाव वालो) से पक्षी (के पैदा करने) की तरह (प्राणी) पैदा करूँगा, फिर मैं उनमे एक नयी रूह फूकूंगा जिस से वे अल्लाह के आदेश के साथ उड़ने वाले हो जायेंगे।

(क़ुरान ३:४९)

यहाँ भी पशु पक्षियों में मनुष्य के जैसे ही अल्लाह के आदेश से रूह फूकने की बात एक पैगम्बर ने बताई जो अल्लाह की तरफ से चमत्कार रूप में प्रकट किया। क्या इससे स्पष्ट नहीं की समीक्षक को क़ुरान का जरा भी ज्ञान नहीं जो विज्ञानं विरुद्ध लिखकर कहा की पशु पक्षियों में आत्मा नहीं होती ? आइये एक और आयत जिससे पूर्णतया स्पष्ट हो जायेगा की पशु पक्षियों की आत्माओ के साथ भी अंतिम दिन इन्साफ होगा अर्थात मनुष्यो की तरह ही पशु पक्षियों की आत्माओ को भी इकठ्ठा किया जाएगा और अल्लाह इंसाफ करेगा देखिये :

धरती में चलने फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नेवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह हैं। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की और इकट्ठे किये जायेंगे।

(क़ुरान ६:३८)

उपरोक्त आयत स्पष्ट वर्णन करती है की पशु हो या पक्षी सब मनुष्यो के जैसे ही गिरोह हैं यानी मनुष्य के जैसे जमात है, और अंतिम दिन पशु पक्षी भी रब की और इकट्ठे किये जाएंगे, अब इससे भी बड़ा सबूत समीक्षक को और क्या चाहिए ? क्या समीक्षक की इस विषय पर की गयी बेतुकी समीक्षा को दिमागी बुखार या पूर्वाग्रही मानसिकता न कहा जाए ?

6. स्वर्ग नरक का कोई अलग लोक नहीं है। (९-७९)

समीक्षा : पुस्तक के लेखक ने या तो वेदादि सत्य शास्त्रो को ध्यानपूर्वक नहीं पढ़ा अथवा ऐसी समीक्षाओं का कारण केवल महर्षि दयानंद की कुरान पर की गयी ज्ञानवर्धक समीक्षाओं पर व्यर्थ का प्रलाप भंजन है। देखिये इस विषय में भी पुनरक्ति दोष है अतः सम्बंधित विषय के अध्याय में विस्तार से वैदिक स्वर्ग और इस्लामी बहिश्त तथा मरणोत्तर जीवन विषय पर तर्क और प्रमाण के साथ लिखा जायेगा, यहाँ केवल संक्षेप में बताया जाता है :

स्वर्ग शब्द स्वः (सुख) से बना है। 'सुखम गच्छति यस्मिन् स स्वर्गः' अर्थात जिसमे सुख की प्राप्ति हो वह स्वर्ग है। अतः प्रत्येक अवस्था तथा प्रत्येक वह स्थान जिसमे मनुष्य सुखी रहता है और दुःख से बचता है स्वर्ग है। आत्मिक स्वर्ग के लिए मुक्ति शब्द है। इसका अर्थ भी दुखो से छूटना है। सांसारिक जीवन में भी मनुष्य किसी विशेष बंधन से छूटता है तो कहता है "मैं इससे मुक्त हो गया" और सुख मिलता है तो कहता है मैं स्वर्ग में हु"

आत्मा के लिए सर्वोत्कृष्ट सुख का आदर्श यह है की वह शरीर अर्थात जन्म मृत्यु के बंधन से छूटकर सर्वसुख तथा आनंद स्वरुप प्रभु (ईश्वर, अल्लाह) की संगती से आनंद प्राप्त करे। कुरआन में जन्नत शब्द शारीरिक और आत्मिक दोनों प्रकार की सफलता के लिए प्रयुक्त किया गया है। बहिश्त में सारे सांसारिक सुख, उत्तम पदार्थ तथा मानसिक शांति आदि फल मिलते हैं वहीँ दूसरी और मुक्ति में ज्ञान, आत्मिक आनन्दादि का प्रवाह चलता है, क्या लेखक इस विषय पर समीक्षा करेंगे की जो सांसारिक सुख इस लोक में हैं जिसमे मनुष्य फंसकर दुःख उठता है, वही सांसारिक सुख, हूरे, गिलमा, सोने के कड़े, चांदी के आभूषण, तकिये गिलाफ, मोती जड़ित बर्तन आदि में फंसकर कौन सा सुख मिलेगा ?

हाँ सर सैयद अहमद खान इसी विषय पर अपनी पुस्तक में क्या लिखते हैं, शायद लेखक ने कभी उसपर विचार प्रकट करते हुए इस्लामी बहिश्त की समीक्षा करने का ख्याल तक न रखा ?

वैदिक स्वर्ग और इस्लामी बहिश्त के विषय में ज्यादा जानकारी विषय से सम्बंधित अध्याय में प्रकट की जायेगी फिलहाल कुछ प्रमाण यहाँ दिए जाते है जिससे पाठकगण स्वर्ग का विशुद्ध स्वरुप ज्ञात कर सके :

ज्योतिष्टोमयाजी स्वर्गं समश्नुते।।
या एवं विहानस्माच्छरीरभेद।
दूर्ध्व उत्क्रामयामुष्मिन स्वर्गे लोके सर्वान् कामानापत्वामृताः समभवत् समभवत्।।
(ऐ० उ० खं० ४ मं ६)
ज्योतिष्टोम यज्ञ करने वाला स्वर्ग को पाता
है।

जो विद्वान इस शरीर के भेद को जानकर पार हो जाता है वह इसी लोक में सब मनोरथो को पूरा करके स्वर्ग को पाटा और अमर हो जाता है और हो भी गए हैं।

अनस्थाः पूताः पबनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम।
नैषां शिश्नम प्रदहति जात वेदः स्वर्गे लोके बहुस्त्रैणमेषाम्।।

अस्थियां जिनकी नज़र न आती हो अर्थात हष्ट, पुष्ट और बलिष्ठ ब्रह्मचारी, पवित्र आचरण युक्त, प्राणायामादि से शुद्ध और निरोग तथा पवित्र मनवाले पुरुष इस पवित्र लोक (गृहस्थ) में प्रविष्ट होते हैं। उनका प्राप्त किया हुआ ज्ञान उनकी काम शक्ति को नष्ट नहीं होने देता। चाहे इस स्वर्ग लोक (गृहस्थ) में उनके आस पास बहुत स्त्रियां रहती हो।

इस मन्त्र में जो बहुस्त्रेण शब्द आया है, उसने उन लोगो को बड़े चक्कर में डाला है जो ब्रह्मचर्यादि के महत्त्व को अनुभव नहीं कर सकते। उन्होंने समझ लिया की स्वर्ग में बहुत सी स्त्रियां मिलेंगी यहाँ तक ७२ हूरो का ख्याल प्रसिद्द हो चूका है। यह स्वर्ग सच्चे अर्थो में इसी गृहस्थ का नाम है। पर अज्ञानवश लोगो ने इसे किसी ऊपर के गुप्त स्थान में मान रखा है। इस मन्त्र में जो बहुत स्त्रियों का वर्णन आया है वो भी समझ लेना चाहिए, क्योंकि जो गृहस्थ में प्रवेश करता है, तब उसके अनेको नए रिश्ते बनते हैं, और मनुष्य सामाजिक प्राणी है अतः जिस नगर में मनुष्य रहता है उसमे अन्य अनेको पुरुषो की अनेको रिश्तो वाली स्त्रीया रहती हैं, अतः स्वर्गलोक (गृहस्थ) में बहुत स्त्रियों का शब्द आना साधारण बात है और जो सदाचारी, संयमी, पवित्र आत्मा, ब्रह्मचारी गृहस्थ में प्रवेश करे उसको यह शिक्षा देना भी परमावशयक है की गृहस्थ आश्रम में भी वह ब्रह्मचर्य का पूरा ख्याल रखे। स्त्रियों की आसपास विद्यमानता होने से जो ब्रह्मचर्य के विरुद्ध भाव उत्पन्न हो सकता है उसमे सावधान करने के लिए वेद का ऐसी नैतिक और उत्तम चारित्रिक शिक्षा देना ही गृहस्थ को स्वर्गधाम बनाने में सहायक हो सकता है। अतः सिद्ध है की स्वर्ग और नरक सुख और दुःख का बोध और बोध करवाने वाले साधनो को ही कहते हैं अन्य लोकादि को नहीं, क़ुरान भी यही आदेश करती है, इस विषय पर विस्तृत व्याख्या विषय से सम्बंधित अध्याय में की जायेगी।

पहले अध्याय में और भी थोड़े आक्षेप समीक्षक ने किये हैं जो अगले अध्यायों में एकसमान ही हैं अतः आगे अध्यायों में उन आक्षेपों का भी निराकरण करने का प्रयास किया जाएगा। यहाँ पहले अध्याय के आक्षेप का विस्तार और संक्षेप दोनों ही प्रकार से उत्तर देने का प्रयास किया गया है। कुछ विषयो पर संक्षेप में लिखा गया है क्योंकि अन्य अध्यायों में भी वही आक्षेप का उत्तर विस्तार से बताया जायेगा।

आप सभी बंधुओ से निवेदन है कृपया अपने महत्वपूर्ण विचार पोस्ट पर अवश्य प्रकट करे।

धन्यवाद

सतीश चंद गुप्ता द्वारा उठाये (4 पिछले पोस्ट के साथ) पहले अध्याय का जवाब पार्ट 5 (A)

पिछली पोस्ट में सतीश चंद गुप्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक के पहले अध्याय में उठाये 15 पॉइंट में से 10 पॉइंट तक के जवाब दिए गए अब गत लेख से आगे बढ़ते हुए बाकी बचे हुए अन्य आक्षेपों तक के जवाब इस लेख के माध्यम से देने का प्रयास किया जाएगा।

1. ईश्वर जगत का निमित्त (Efficient Cause) कारण है, उपादान कारण (Material Cause) नहीं है। (७-४५) (८-३)

इस आक्षेप में लेखक आगे लिखता है :

वैदिक धर्म एकेश्वरवाद का प्रतिपादन करता है और उसे सृष्टिकर्ता भी मानता है, मगर स्वामी दयानंद ने कहा की उपादान कारण के बिना जगत की उत्पत्ति संभव नहीं। ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनो अनादि हैं। ईश्वर मात्र शिल्पी है, उसने सृष्टि का विकास किया है, सृजन नहीं किया। अर्थात जिस प्रकार कुम्भकार ने घड़ा बनाया, मिटटी नहीं बनाई, ठीक इसी प्रकार परमेश्वर ने जगत बनाया। प्रकृति और जीव दोनों संसाधन (Material) पहले से मौजूद थे।

समीक्षा : आइये देखिये लेखक ने महर्षि की बात को कितना समझा और जाना, महर्षि दयानंद ने ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीनो अनादि हैं का सार्वभौमिक और अटल सिद्धांत वेद ज्ञान के आधार पर ही दिया है, लेकिन कुछ लोग इसे पूर्ण न समझकर व्यर्थ आक्षेप करते हैं, देखिये महर्षि ने क्या समझाने का प्रयास किया है :

६-‘अनादि पदार्थ’ तीन हैं। एक ईश्वर, द्वितीय जीव, तीसरा प्रकृति अर्थात् जगत् का कारण, इन्हीं को नित्य भी कहते हैं। जो नित्य पदार्थ हैं उन के गुण, कर्म, स्वभाव भी नित्य हैं।

८-‘सृष्टि’ उस को कहते हैं जो पृथक् द्रव्यों का ज्ञान युक्तिपूर्वक मेल होकर नाना रूप बनना।

(स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाशः)

यहाँ विचारणीय है की ऋषि जिस महत्वपूर्ण सिद्धांत की और ध्यानाकर्षित कर रहे वो कितना विज्ञानपूर्ण महत्त्व रखता है देखिये, ये जगत जो कार्य रूप दिख रहा है, वह जड़ यानी अचेतन है, और ईश्वर चेतन सत्ता है, कोई भी चेतन सत्ता अपने में से कभी भी जड़ पदार्थ उत्पन्न नहीं कर सकती। क्योंकि चेतन सत्ता चेतन ही उत्पन्न करती है जो उसके जैसा ही होता है ये सार्वभौमिक नियम है। मनुष्य, पशु, पक्षी चेतन सत्ता हैं वे कभी जड़ पदार्थ उत्पन्न नहीं कर सकते। और जड़ पदार्थ जड़ होता है वो वैसे भी स्वयं से कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता है। मुस्लिम बंधू अल्लाह को चेतन मानते हैं, लेकिन उसी चेतन से जड़ पैदा हुआ ये तथ्य कैसे स्वीकार्य है जबकि क़ुरान में कहीं नहीं लिखा की अल्लाह ने अपने में से धरती आकाश पैदा किये। यदि कहीं लिखा हो तो लेखक दिखाए ?

अब कुछ ऐसा भी कहते हैं चेतन से चेतन उत्पन्न होता है तो ईश्वर से जीव क्यों नहीं क्योंकि दोनों चेतन हैं तो इसका जवाब केवल इतने से ही समझ आ जायेगा की ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापी है तथा जीव अल्पज्ञ और एकदेशी है, ये दोनों सत्ता वस्तुतः चेतन हैं मगर दोनों के गुण भिन्न हैं, अतः ये सिद्ध है की ईश्वर और जीव भिन्न भिन्न चेतन सत्ता है क्योंकि यदि ईश्वर से ही जीव की उत्पत्ति हुई होती तो जीव भी सर्वज्ञ, सर्वव्यापी होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता, लेकिन दोनों ही चेतन सत्ता अजर हैं क्योंकि इनकी उत्पत्ति कभी नहीं होती और प्रकृति निर्जीव सत्ता है जो उपादान कारण है। इसमें वेद से प्रमाण है :

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति ||
ऋग्वेद म.1| सू.164| म.20||

महर्षि दयानन्द जी ने इसके अर्थ इस प्रकार किये हैं -
(द्वा) जो ब्रह्म और जीव दोनों (सुपर्णा) चेतनता और पालनादि गुणों में सद्दश (सयुजा) व्याप्य व्यापक भाव से संयुक्त (सखाया) परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और (समानम्) वैसा ही (वृक्षम्) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न भिन्न हो जाता है वह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनों के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं (तयोरन्यः) इन जीव व ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस वृक्षरूप संसार में पापपुण्यरूप फलों को (स्वाद्वति) अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को (अनश्नन्) न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर बाहर प्रकाशमान हो रहा है | जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप; तीनों अनादि हैं ।

अब क़ुरान से प्रमाण दिखाते हैं की ईश्वर (अल्लाह), जीव और प्रकृति तीन सत्ताएं अनादि हैं देखिये :

अल्लाह का ९९वे वा नाम "अल-बरी" है जिसके मायने हैं, "विकासक" अर्थात जो विकास करता है। अब क़ुरान से वो आयत दिखाते हैं जहाँ अल्लाह को विकासक बताया है :

"अल्लाह प्रत्येक वस्तु को उस की स्थति के अनुसार उसे आकृति एवं रूप प्रदान करने वाला है।"

(क़ुरान ५९:२५)

आइये अब दिखाते हैं क़ुरान की वो आयत जिसमे सृष्टि को अनादि बताया गया है :

फिर उसने आकाश की और ध्यान दिया और (आकाश) केवल एक प्रकार के कुहरा सामान था। उस (अल्लाह) ने उस (आकाश) से तथा धरती से कहा की तुम दोनों स्वेच्छापूर्वक या अनिच्छापूर्वक मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए आ जाओ, तो वे दोनों बोले की हम आज्ञाकारी बन कर आ गए हैं।

(क़ुरान ४१:१२)

उपरोक्त आयत में आकाश और धरती पहले से विद्यमान है, जब अल्लाह ने बुलाया तो अत्यंत आज्ञाकारी बनकर आ गए। अतः इस आयत में अल्लाह के अतिरिक्त एक निर्जीव सत्ता विद्यमान तो है, पर वो निर्जीव सत्ता सुन सकती है, ऐसा अद्भुद विज्ञानं हमें क़ुरान पढ़ने पर ही ज्ञात हुआ।

क्या इंकार करने वालो ने यह नहीं देखा की आकाश तथा धरती दोनों बंद थे। अतः हमने उन्हें खोल दिया।

(क़ुरान २१:३१)

यहाँ भी आकाश और धरती पहले से ही विद्यमान हैं जो कारण रूप में हैं उन्हें अल्लाह मियां कार्य रूप में ले आये।

निस्संदेह तुम्हारा रब अल्लाह ही है जिसने आसमानो और जमीन को छह दिनों में पैदा किया है, फिर वह राज सिंघासन पर दृढ़ता पूर्वक विराजमान हो गया।

(क़ुरान ७:५५)

यहाँ अल्लाह और अल्लाह का सिंघासन पहले से विद्यमान है, अतः सिद्ध है की अल्लाह के साथ साथ एक निर्जीव सत्ता अनादि है। लेकिन सोचने वाली बात यह यह की जो सर्वशक्तिमान सत्ता "अल्लाह" मात्र कहता है और हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है मगर सृष्टि को बनाने में छह दिन लग गए ? ये हमें क़ुरान पढ़ने पर ही ज्ञात हुआ।

और वही है जिसने आसमानो और जमीन को छह दिनों में पैदा किया है ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले की तुम में से किन कर्म अधिक अच्छे हैं और उसका अर्श पानी पर है।

(क़ुरान ११:८)

यहाँ अल्लाह के सिंघासन के साथ साथ पानी भी अनादि तत्व विद्यमान है।

और आसमान फट जाएगा तथा वह उस दिन बिलकुल कमजोर दिखाई देगा (१७)

और फ़रिश्ते उस के किनारो पर होंगे तथा उस दिन तेरे रब्ब के अर्श (सिंघासन) को आठ फ़रिश्ते उठा रहे होंगे। (१८)

क़ुरान (६९:१७-१८)

यहाँ जब प्रलय आ जाएगी उसके बाद की कहानी बताई जा रही है, अतः सिद्ध है की अल्लाह का सिंघासन और उसको उठाने वाले फ़रिश्ते अनादि हैं। लेकिन आकाश फाड़कर प्रलय आएगी ये क़ुरान का विज्ञानं सोचने वाला है।

वे नरक (की आग में पड़ने) वाले हैं और इसमें पड़े रहेंगे। (८२)

और जो लोग ईमान लाये हैं तथा शुभ कर्म किये हैं वे उसमे सदैव निवास करेंगे। (८३)

(क़ुरान २:८२-८३)

यहाँ जीवो की स्थति बताई है, जो अल्लाह और रसूल का इंकार करने वाले और अल्लाह की नजर में यही सबसे बुरा कर्म है, अतः जो ऐसे बुरे कर्म करने वाले हैं नरक में जायेंगे और जो ईमान लाये वो जन्नत जायेंगे तथा उसमे वे सदैव रहेंगे।

अर्थात क़ुरान के अनुसार भी ईश्वर, जीव और प्रकृति अनादि सिद्ध होते हैं। क्योंकि प्रलय (क़यामत) के बाद अल्लाह जीवो को इकठ्ठा करेगा और जन्नत जहन्नम को उनसे भरेगा। अब हमारा सवाल लेखक से है की जब क़यामत में यदि पूरी दुनिया और सब कुछ नष्ट हो जाएगा तो जन्नत में अंगूर, दूध की नहर, सोने के कड़े, सुन्दर बिछौने, और हूरे गिलमा आदि जन्नती मनुष्यो के साथ सदैव रहेंगे और जहन्नम में आग, जक्कूम का वृक्ष और खोलता पानी वहां के जीवो के साथ सदैव रहेगा तो ऐसा कैसे संभव है की दुनिया भी नष्ट होगी और ये सब भी रहेगा ? क्या लेखक को अब भी संदेह है की सृष्टि अनादि नहीं ?

ये ही कुछ उपरोक्त आयतो और क़ुरान में मौजूद अनेको आयतो को पढ़ने के बाद ये सिद्ध हो जाता है की लेखक ने केवल पूर्वाग्रह के आधार पर ही ऋषि के सत्यार्थ प्रकाश पर अपनी अज्ञानता पूर्ण टिका टिप्पणी की हैं, यदि क़ुरान का अवलोकन ही कर लिया होता तो ऐसी शंकाए उठाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती।

2. सृष्टि का प्रारम्भ नहीं है, अर्थात सृष्टि का कोई आदि सिरा नहीं है। (८:५३)

समीक्षा : शायद लेखक ने महर्षि की बात को सही से समझने का प्रयास ही नहीं किया क्योंकि लेखक के लेखन से महसूस होता है की लेखक केवल ऋषि की बातो पर आक्षेप ही करना चाहता है, समझना कुछ भी नहीं, देखिये ऋषि ने क्या कहा :

८-‘सृष्टि’ उस को कहते हैं जो पृथक् द्रव्यों का ज्ञान युक्तिपूर्वक मेल होकर नाना रूप बनना। (स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाशः)

यानि जब जब कारण रूप से कार्य रूप में सृष्टि आएगी यानि जब जब जगत लय (छुप, कारण) को प्राप्त होकर दृश्य (कार्य) रूप में आएगा आएगा ये सृष्टि है। ये कार्य निरंतर चलता है। यानी जब जब प्रलय आएगी तब रात्रि और जब जब सृष्टि पुनः अस्तित्व में आयगी तब दिन स्वरुप समझे। ये प्रत्येक कल्प (१४ मन्वन्तर) तक सृष्टि कार्य रूप रहती है, इसे सामान्य भाषा में ब्रह्म दिन के नाम से जानते हैं। और जब ये समय पूरा हो जाता है तब प्रलय होती है इसे इसे सामान्य भाषा में ब्रह्म रात्रि के नाम से जानते हैं। जितने समय यानी १४ मन्वन्तर का दिन होता है उतने ही समय की रात्रि होती है। यानी प्रलय के बाद ये सब जगत सूक्ष्म रूप (कारण अवस्था) में रहता है।

७-‘प्रवाह से अनादि’ जो संयोग से द्रव्य, गुण, कर्म उत्पन्न होते हैं वे वियोग के पश्चात् नहीं रहते परन्तु जिस से प्रथम संयोग होता है वह सामर्थ्य उन में अनादि है और उस से पुनरपि संयोग होगा तथा वियोग भी, इन तीनों को प्रवाह से अनादि मानता हूँ। (स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाशः)

जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन, ऐसे ही रात से पूर्व दिन और दिन से पूर्व रात रहता है, इसी कारण से ऋषि ने सृष्टि क्रम को अनादि कहा है। इसे प्रवाह रूप कहते हैं, अब इसमें दिन पहले आया या रात शायद लेखक बता सके ?

आइये अब लेखक को क़ुरान क्या कहती है वो दिखाते हैं :

और वह संसार की उत्पत्ति को आरम्भ भी करता है और फिर उसे बार बार दोहराता रहता है और यह बात उसके लिए अति सुगम है।

(कुरान ३०:२८)

यहाँ संसार की उत्पत्ति बताई है और आरम्भ साथ में ये प्रोसेस बार बार चलता रहता है ये भी स्पष्ट कर दिया है, क्या अब समीक्षा करने में निपुण लेखक क़ुरान की इस आयात की समीक्षा करके बता पाएंगे की जब बार बार यानि प्रवाह से अनादि चक्र सृष्टि का चल रहा है तो इसका पहली बार सृजन कब हुआ ?

ऐसी ही क़ुरान में अनेको आयते हैं जिनमे सृष्टि को प्रवाह से अनादि बताया है, जब ऋषि ने वेदादि आर्ष ग्रंथो को पढ़कर सत्यार्थ प्रकाश में भी यही बताया तो इससे लेखक की सत्याग्रही सोच प्रदर्शित नहीं होती जबकि पूर्वाग्रह से ग्रस्त मानसिकता का बोध अवश्य ही होता है।

3. सम्पूर्ण मानवता एक माँ बाप की संतान नहीं है (८:५१)

समीक्षा : समीक्षक महोदय अपने आक्षेपों की प्रक्रिया में कुछ इस कदर फंसे की विज्ञानं और सामजिक ताने बाने को पूरी तरह ताक पर रख दिया, यहाँ तक की समीक्षक ने उस सिद्धांत की धज्जिया उड़ा दी जिससे सामजिक परिवेश में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है और सामाजिक संरचना और पारिवारिक मूल्यों में बढ़ती होती है, मगर समीक्षक को शायद सामाजिक परिवेश और नैतिक मूल्यों से कोई सरोकार नहीं मगर नियोग जैसी व्यवस्था पर बेवजह एक अध्याय लिखने तक को तैयार हैं, मगर कुरान में प्रतिपादित अनेको कुरीतियों और व्यवस्थाओ पर समीक्षा को तैयार नहीं उसी का नतीजा है की पूरी तरह अप्राकृतिक और अवैज्ञानिक आधार पर भी सम्पूर्ण मानवता को एक माँ बाप की संतान सिद्ध करने पर समीक्षक का पूरा जोर है, जबकि ये सिद्धांत न तो कुरान मानने को तैयार है और ना ही महर्षि दयानंद को ही ये बात स्वीकार हुई मगर समीक्षक को आपत्ति है, आइये पहले क़ुरान, बाइबिल और वेद के आलोक में देखे :

बाइबिल :

"Polls by Gallup and the Pew Research Center find that four out of 10 Americans believe humanity descend from Adam and Eve, but NPR reports that evangelical scientists are now saying publicly that they can no longer believe the Genesis account and that it is unlikely that we all descended from a single pair of humans.'That would be against all the genomic evidence that we've assembled over the last 20 years so not likely at all,'says biologist Dennis Venema, a senior fellow at BioLogos Foundation,

गैलप एंड द पिउ रिसर्च सेंटर द्वारा किये गए पोल्स में प्रत्येक १० अमेरिकी नागरिको में से ४ ने स्वीकार किया की सम्पूर्ण मानवता आदम और हव्वा से निकली है, लेकन एनपीआर रिपोर्ट्स के मुताबिक इंजील के शोधकर्ताओं का अब ये मानना है और ये बात वो सार्वजानिक तौर से बता भी रहे हैं की उत्पत्ति अध्याय के आधार पर सम्पूर्ण मानवता एक माता पिता (आदम हव्वा) की संतान नहीं है। डेनिस वेनेमा बायोलोगोस फाउंडेशन की वरिष्ठ बाोलॉजिस्ट का कहना है की उनकी संस्था द्वारा पिछले २० वर्षो में एकत्र किये गए जेनेमिक प्रमाणों से आदम हव्वा का सिद्धांत एकदम उलट है, यानी सम्पूर्ण मानवता के जो जेनेमिक आंकड़े पाये गए वो एक माता पिता के नहीं अनेको माता पिता के हैं।

"दा इकोनॉमिस्ट" द्वारा नवंबर २०१३ में प्रायोजित चर्चा कार्यक्रम में इंजील के शोधकर्ताओं ने माना और विज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर ये सिद्ध करने का प्रयास किया गया की सम्पूर्ण मानवता कम से कम १०,००० (दस हजार) दम्पत्तियों (माता पिता) की संतान है, एक आदम और हव्वा की नहीं।

अब थोड़ा क़ुरान का नजरिया :

हमने उन्हें कहा की "निकल जाओ। तुम में से कुछ व्यक्ति एक दूसरे के हैं।

(क़ुरान २:३७)

यहाँ ध्यान देने वाली बात है की अल्लाह मियां वर्तमान भाव में कह रहे हैं की तुम में कुछ व्यक्ति एक दूसरे के शत्रु हैं, यहाँ भविष्यवत आधार पर नहीं कहा जा रहा की तुम में से कुछ एक दूसरे के शत्रु होंगे, क्योंकि उस समय भी आदम हव्वा अकेले नहीं थे, अनेको स्त्री पुरुष थे।

तब हमने कहा की तुम सब के सब इस में से निकल जाओ।

(क़ुरान २:३९)

यहाँ भी अल्लाह मियां ने पहले वाली आयत के आधार पर ही सभी को निकलने का आदेश दिया है, क्योंकि यदि अकेले आदम हव्वा होते तो "सब के सब" निकल जाओ ये न कहते, तुम दोनों निकल जाओ ऐसा कहते। अतः सिद्ध है की अनेको आदि मनुष्यो द्वारा मनुष्य जाती उत्पन्न हुई।

अब थोड़ा वैज्ञानिक नजरिया :

आस्तिक विकासवाद की धारा से ओतप्रोत डॉ. फ्रांसिस कॉलिन्स अपनी पुस्तक The Language of God: A Scientist Presents Evidence for Belief में लिखते हैं की मनुष्य जाती की उत्पत्ति कम से कम दस हजार दम्पत्तियों (माता पिता युग्म) द्वारा संभव है जो आज से १ लाख से लेकर 1.5 लाख वर्षो पूर्व रहे होंगे।

यहाँ इस पुस्तक में डॉ फ्रांसिस कॉलिन्स ने वैज्ञानिक (जेनेटिक) आधार पर इस बात का निष्कर्ष निकाला है। और इसी पुस्तक के आधार पर आदम हव्वा का महज ५००० वर्ष पुराना इतिहास होना खंडित हो जाता है। क्योंकि वैज्ञानिको ने हाल में ही ४ लाख वर्ष पुराना ह्यूमन फॉसिल खोज निकाला है। अतः जैसे जैसे वैज्ञानिक नए शोध करते जाएंगे वैसे वैसे वेद और आर्य सिद्धांत प्रबल होते जायेंगे। हम समीक्षक से आग्रह करते हैं वो विज्ञानं आधार पर आदम और हव्वा से मानव सृष्टि की उत्पत्ति महज ५००० वर्ष पूर्व हुई ये साबित कर दिखाए अथवा इस विषय पर भी समीक्षा करे ताकि सत्य का ज्ञान मनुष्यो के बीच प्रकट हो सके।

4. वेद आवागमनीय पुनर्जन्म की अवधारणा का प्रतिपादन करते हैं। (9-75)

समीक्षा : वैदिक सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, अटल हैं, शाश्वत सत्य हैं, कभी नहीं बदल सकते मगर लेखक शायद समीक्षाओं की समीक्षा में इतना व्यस्त हुए की सत्य को भी नजर अंदाज़ कर दिया। आइये पहले हम क़ुरान में देखते हैं की पुनर्जन्म विषय पर कुरान का क्या कहना है :

जिस प्रकार उसने तुम्हारा प्रारम्भ किया था। तुम फिर एक दिन उसी पहली हालत की और लौटोगे।

(क़ुरान ७:३०)

पहली बार कैसे पैदा किया था जरा उस पर ध्यान दीजिये :

हमने तुम्हे सर्वप्रथम मिटटी से पैदा किया था, फिर वीर्य से, फिर उन्नति दे कर एक ऐसी अवस्था से जो चिपट जाने का गुण रखती थी, फिर ऐसी अवस्था से की वह मांस की एक बोटी के सामान थी, ……… फिर हम तुम्हे एक बच्चे के रूप में निकलते हैं।

(क़ुरान २२:५)

यहाँ प्रथम बार कैसे उत्पत्ति की जाती है उसका विस्तार से उल्लेख है और ऊपर वाली आयत में बताया गया की जैसे पहली बार उत्पन्न किया वैसे ही पहले वाली हालत में पुनः लौटोगे। तो ये पुनर्जन्म क्यों नहीं ?

अन्य क़ुरानी आयत

फिर जब उन्होंने उन बातो से रुकने की अपेक्षा जिन से उन्हें रोका गया था और भी आगे बढ़ना शुरू किया तो हमने उन्हें कहा की तुच्छ (जलील) बंदर बन जाओ।

(क़ुरान ७:१६७)

यहाँ आयत में पुनर्जन्म सिद्ध होता है क्योंकि अल्लाह ने पूरी बस्ती के लोगो यानी मनुष्यो को बन्दर बना दिया क्योंकि उन्होंने अल्लाह की केवल नसीहत मानने से मना कर दिया। क्या ये अल्लाह की दया और कृपा है ? लेखक इस पर अपने विचार कब प्रकट करेंगे ?

यहाँ ये बात स्पष्ट है की जीव जो है वो पशु में भी है और मनुष्य में भी, और ये भी सिद्ध हुआ की मनुष्य में जो जीव है वो ही पशु आदि में पुनर्जन्म धारणा से शरीर धारण कर सकता है और जो पशु आदि का जीव है वो मनुष्य का लेकिन इसके पीछे कर्मो के फल की धारणा अवश्य होनी चाहिए अन्यथा यदि केवल अल्लाह की नसीहत नहीं मानने के कारण ही ऐसा हो तो ऐसे में अल्लाह अन्यायकारी ही ठहरेगा।

4. वे कहेंगे की हे हमारे रब ! तूने हमें दो बार मौत दी और दो बार जीवित किया।
(क़ुरान ४०:१२)

यहाँ भी इस आयत में पुनर्जन्म सिद्ध होता है, क्योंकि यदि एक बार ही मौत और एक बार ही जन्म होता तो यहाँ ऐसे नहीं लिखा जा सकता था, इसके अतिरिक्त भी पूरी क़ुरान में अल्लाह ने पुनर्जन्म विषय में अनेक बार मृत जमीन और वर्षा का दृष्टांत किया जिसमे अल्लाह ने बार बार जोर देकर समझाया है की ईमान वालो को और धरती में मौजूद सभी लोगो के लिए बड़ी निशानी है की वो मृत जमीन पर आकाश से पानी बरसता है तो वो जीवित हो उठती है क्या वो तुम्हे इसी प्रकार जीवित नहीं करेगा। (क़ुरान ४५:६, २:१६५) आदि अनेको प्रमाण क़ुरान में ही मौजूद हैं जो अल्लाह द्वारा बुद्धिमान जाती के लिए बड़ी निशानियों में शुमार है की वर्षा केवल एक बार ही नहीं होती जो मृत धरती को जिन्दा करे बल्कि बारम्बार होती है, ये निरंतर प्रक्रिया है, शाश्वत सत्य है, अब देखना ये है की समीक्षक इस विषय पर अपनी समीक्षा कब करते हैं।

अब इस विषय पर विज्ञानं से रौशनी डालते हैं, जो भी पदार्थ है वो कभी नष्ट नहीं होता जैसे पानी भाप बनकर उड़ जाता है पुनः बादलो के रूप में एकत्रित होकर बरसता है फिर भाप बनकर उड़ जाता है, ठीक ऐसे ही लकड़ी से सामान बना, उसके बाद अन्य कार्य में लिया गया अलमारी आदि बनाने में, पश्चात ख़राब होने पर जलाया तो कोयला बना, कोयले से राख, राख से मिटटी और फिर उसी मिटटी से पुनः पेड़ पौधों के रूप में उग आता है। यह सार्वभौमिक सत्य है, आपने न्यूज चॅनेल और अनेको अखबारों में खबर भी पढ़ी होंगी की अमुक व्यक्ति को अपना पिछला जन्म याद आ गया, अमुक ने अपने पूर्व जन्म की माता पिता आदि कुटुम्बियों से मेल किया आदि अनेको खबरे प्राप्त होती हैं, इस विषय पर अनेको विज्ञानिको ने रिसर्च भी की है और प्रमाणित भी किया है उनमे से एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ इयान स्टेवेंसन्स हैं, उन्होंने अपनी अनेको किताबो "Twenty Cases Suggestive of Reincarnation (1966), "European Cases of the Reincarnation Type" (1972), आदि अनेको पुस्तको के माध्यम से पुनर्जन्म अवधारणा को प्रमाणित किया जिनको आज तक मनोवैज्ञानिक अपने वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे तो यहाँ ही विस्तार से बता दिया फिर भी विषय से सम्बंधित अन्य अध्याय में विस्तार से बताया जा सकता है, क्योंकि समीक्षक की पुस्तक में पुनरुक्ति दोष का बारम्बार प्रकट होना समीक्षक की पुस्तक और लेखन तथा ज्ञान पर दोष प्रकट करता है, अब चाहे तो समीक्षक अपनी अगली पुस्तक में ऐसी गलती न दोहराये ये उनकी इच्छा पर निर्भर है।

दो पॉइंट इस पोस्ट में छूट गए जो की पोस्ट की शब्द सीमा होने कारण यहाँ नहीं लिखे जा रहे, अतः अगली पोस्ट में उनको पढ़ लेवे 

सतीश चंद गुप्ता द्वारा उठाये पहले अध्याय के 11-15 / 15 पॉइंट का जवाब ...... पार्ट 4

पिछली पोस्ट में सतीश चंद गुप्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक के पहले अध्याय में उठाये 15 पॉइंट में से 10 पॉइंट तक के जवाब दिए गए अब गत लेख से आगे बढ़ते हुए 11 से 15 पॉइंट तक के जवाब इस लेख के माध्यम से देने का प्रयास किया जाएगा।

11. ईश्वर अपने भक्तों के पाप क्षमा नहीं करता। (7-52) (14-15)

समीक्षा : प्रस्तुत पुस्तक के लेखक शायद अपनी लेखनी में वो वजन नहीं बना रहे की महर्षि के द्वारा क़ुरान पर उठाई गयी शंकाओ और समीक्षाओं पर वाजिब टिप्पणी कर पाये या फिर लेखक को क़ुरान और बाइबिल आदि अन्य मत मतांतरों की शिक्षाओ का ज्ञानाभाव है क्योंकि क़ुरान में ही अल्लाह मियां अनेको जगह अपने भक्तो के पाप क्षमा नहीं करते।

बाबा आदम और हव्वा ये वो नाम है जो अल्लाह ने अपने हाथो से बनाया और इनको वो ज्ञान दिया जो सर्वोत्कृष्ट था, मगर शायद उतना ज्ञान भी नहीं दिया जितना शैतान को था तो बाबा आदम को सर्वोत्कृष्ट ज्ञान दिया इसपर शंका होती है, क्योंकि जो अपने नंगे होने को नहीं जान पाये उनके ज्ञान (इल्म) में अल्लाह ने कमी रखी और उन्हें ज्ञान प्राप्त करने वाले फल से भी दूर रखा लेकिन शैतान ने क़ुरान में बाबा आदम और हव्वा को सच बोल दिया और अंततः आदम हव्वा को अदन का बाग़ (जन्नत) से निकलवा कर पृथ्वी पर लड़ाई झगड़ा और खून खराबा खातिर एक दूसरे का शत्रु बनवाकर भिजवा दिया। लेकिन सोचने वाली बात ये है की बाबा आदम अपनी इस गलती पर अल्लाह से माफ़ी मांगते रहे, मगर अल्लाह मियां ने माफ़ नहीं किया देखिये :

उन दोनों ने कहा की हे हमारे रब ! हम ने अपने आप पर अत्याचार किया। यदि तू हमें क्षमा नहीं करेगा एवं हम पर दया नहीं करेगा तो हम अवश्य घाटा पाने वालो में से हो जायेंगे। (२४)

तब उस (अल्लाह) ने कहा की तुम सारे के सारे यहाँ से चले जाओ। तुम में से कुछ लोग दूसरे कुछ लोगो के शत्रु होंगे और तुम्हारे लिए इसी धरती में ठिकाना तथा कुछ समय तक (भाग्य) में लाभ उठाना होगा। (२५)

फिर कहा की इसी पृथ्वी में तुम जीवित रहोगे और इसी में मरोगे और इसी में से निकले जाओगे। (२६)

(क़ुरान ७:२४-२६)

अब यहाँ लेखक को ज्ञात होना चाहिए की जो ईश्वर के क्षमा करने पर महर्षि के आक्षेप पर समीक्षा की वो क़ुरान के हिसाब से भी ठीक विदित नहीं होती क्योंकि ये कोई ऐसा पाप नहीं था जिसे अल्लाह माफ़ नहीं कर सकता था, न ही आदम ने अल्लाह से हटकर कोई पूज्य बनाया, ना ही कुफ्र किया, न पत्थर पूजा, बल्कि उसने तो ज्ञान बढ़ाने वाले वृक्ष का फल खाया, जिससे अल्लाह ने रोका था, अब ये बात तो सिद्ध है की ईश्वर पाप का फल देता है, लेकिन यहाँ तो इस आयत में पाप की जगह पुण्य कार्य यानी ज्ञान वृद्धि को ही पाप मान कर अल्लाह ने आदम हव्वा को गुनहगार बना दिया, जबकि महर्षि ने इसी बात पर सत्यार्थ प्रकाश में जो समीक्षा की वो समझने वाली है, देखिये :

"(समीक्षक) अब देखिये खुदा की अल्पज्ञता! अभी तो स्वर्ग में रहने का आशीर्वाद दिया और पुनः थोड़ी देर में कहा कि निकलो। जो भविष्यत् बातों को जानता होता तो वर ही क्यों देता? और बहकाने वाले शैतान को दण्ड देने से असमर्थ भी दीख पड़ता है। और वह वृक्ष किस के लिये उत्पन्न किया था? क्या अपने लिये वा दूसरे के लिये ? जो अपने लिये किया तो उस को क्या जरूरत थी? और जो दूसरे के लिये तो क्यों रोका? इसलिये ऐसी बातें न खुदा की और न उसके बनाये पुस्तक में हो सकती हैं। आदम साहेब खुदा से कितनी बातें सीख आये? (१२)"
(सत्यार्थ प्रकाश चतुर्दश समुल्लास)

यदि अल्लाह अपने भक्तो के पाप क्षमा करता होता तो बाबा आदम और हव्वा कभी धरती पर आते ही नहीं, इसलिए सिद्ध है की अल्लाह न तो आदम के न ही जिन्नो के पाप क्षमा करता है, लेकिन यहाँ तो अल्लाह मिया पर ही आक्षेप खड़ा हो जाता है की बहकाने वाले को तो मोहलत दी और जिसकी कोई गलती नहीं उसे दंड दिया, अब लेखक इस पर समीक्षा कब करेंगे ?

12. तथ्य - सूर्य केवल अपनी परिधि (Axis) पर घूमता है किसी लोक के चारों ओर (Orbit) नहीं घूमता। (8-71)

समीक्षा : अब देखिये लेखक की कितनी बड़ी अज्ञानता की महर्षि की बात को बिना सोचे समझे ही क्या से क्या लिख डाला, मुझे तो लेखक पूर्वाग्रह से अत्यधिक पीड़ित लगता है क्योंकि जो बिना पूर्वाग्रह के सत्यार्थ प्रकाश पढ़ लिया होता तो इतनी बड़ी अवैज्ञानिक बात नहीं करता, देखिये महर्षि ने क्या लिखा और लेखक ने अल्पज्ञता से क्या समझा :

आ कृष्णेन रजसा वत्तर्मानो निवेशायन्नमतृं मर्त्यं च ।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।
यजुः० अ० ३३। मं० ४३।।

जो सविता अर्थात् सूर्य्य वर्षादि का कर्त्ता, प्रकाशस्वरूप, तेजोमय, रमणीयस्वरूप के साथ वर्त्तमान; सब प्राणी अप्राणियों में अमृतरूप वृष्टि वा किरण द्वारा अमृत का प्रवेश करा और सब मूर्तिमान् द्रव्यों को दिखलाता हुआ सब लोकों के साथ आकर्षण गुण से सह वर्त्तमान; अपनी परिधि में घूमता रहता है किन्तु किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता। वैसे ही एक-एक ब्रह्माण्ड में एक सूर्य्य प्रकाशक और दूसरे सब लोकलोकान्तर प्रकाश्य हैं। जैसे-

दिवि सोमो अधि श्रितः।। -अथर्व० कां० १४। अनु० १। मं० १।।

जैसे यह चन्द्रलोक सूर्य्य से प्रकाशित होता है वैसे ही पृथिव्यादि लोक भी सूर्य्य के प्रकाश ही से प्रकाशित होते हैं। परन्तु रात और दिन सर्वदा वर्त्तमान रहते हैं क्योंकि पृथिव्यादि लोक घूम कर जितना भाग सूर्य के सामने आता है उतने में दिन और जितना पृष्ठ में अर्थात् आड़ में होता जाता है उतने में रात। अर्थात् उदय, अस्त, सन्ध्या, मध्याह्न, मध्यरात्रि आदि जितने कालावयव हैं वे देशदेशान्तरों में सदा वर्त्तमान रहते हैं अर्थात् जब आर्य्यावर्त्त में सूर्योदय होता है उस समय पाताल अर्थात् ‘अमेरिका’ में अस्त होता है और जब आर्य्यावर्त्त में अस्त होता है तब पाताल देश में उदय होता है। जब आर्य्यावर्त्त में मध्य दिन वा मध्य रात है उसी समय पाताल देश में मध्य रात और मध्य दिन रहता है। जो लोग कहते हैं कि सूर्य घूमता और पृथिवी नहीं घूमती वे सब अज्ञ हैं। क्योंकि जो ऐसा होता तो कई सहस्र वर्ष के दिन और रात होते। अर्थात् सूर्य का नाम (ब्रध्नः) है। यह पृथिवी से लाखों गुणा बड़ा और क्रोड़ों कोश दूर है। जैसे राई के सामने पहाड़ घूमे तो बहुत देर लगती और राई के घूमने में बहुत समय नहीं लगता वैसे ही पृथिवी के घूमने से यथायोग्य दिन रात होते हैं; सूर्य के घूमने से नहीं। जो सूर्य को स्थिर कहते हैं वे भी ज्योतिर्विद्यावित् नहीं। क्योंकि यदि सूर्य न घूमता होता तो एक राशि स्थान से दूसरी राशि अर्थात् स्थान को प्राप्त न होता। और गुरु पदार्थ विना घूमे आकाश में नियत स्थान पर कभी नहीं रह सकता।
(सत्यार्थ प्रकाश अष्टम समुल्लास)

महर्षि दयानंद ने वेदो और आर्ष ग्रंथो के गहन शोध पश्चात ही सत्यार्थ प्रकाश लिखा, जिसमे साफ़ साफ़ लिखा है की सूर्य अपनी परिधि में तो घूमता है साथ ही आकाशगंगा का चक्कर भी लगाता है क्योंकि यदि सूर्य न घूमता तो एक राशि से दूसरी राशि को प्राप्त न होता। ये बात पूर्णतः वैज्ञानिक है, इसका प्रबल प्रमाण है की हम आर्य लोग मकर संक्रांति नामक पर्व मानते हैं क्योंकि इसी दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिये इस पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं।

सूर्य किसी लोक का चक्कर नहीं लगाता क्योंकि सभी लोक सूर्य का चक्कर लगाते हैं, शायद आपको गांगेयवर्ष समझ नहीं आ रहा इसलिए कुछ दिक्कत हो रही है, आइये आपको गंगेयवर्ष समझाने का प्रयास करते हैं, देखिये हमारा सौरमंडल सूर्य और उसकी परिक्रमा करते ग्रह, क्षुद्रग्रह और धूमकेतुओं से बना है। इसके केन्द्र में सूर्य है और सबसे बाहरी सीमा पर वरुण (ग्रह) है। वरुण के परे यम (प्लुटो) जैसे बौने ग्रहो के अतिरिक्त धूमकेतु भी आते है।

जब केंद्र में सूर्य है, और वो अपनी धुरी पर घुमते हुए अन्य लोको को आकर्षण से बांधते हुए अपनी कक्षा में घूम कर अन्य लोको के साथ सौरमंडल के केंद्र में रहते हुए एक चक्कर लगता है उसे गांगेय वर्ष कहते हैं, क्योंकि सूर्य सौरमंडल के केंद्र में है इसलिए वो किसी ग्रह का चक्कर नहीं लगा सकता यदि सूर्य सौरमंडल के केंद्र में न होता और कोई अन्य ग्रह केंद्र में होता तब आप कह सकते थे की सूर्य उस ग्रह का चक्कर लगता है, हालाँकि ये हो ही नहीं सकता, क्योंकि सूर्य स्वयं सौरमंडल के केंद्र में है जिससे सभी ग्रहो को आकर्षण से बंधे रखता है और सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं साथ ही सूर्य उन सभी ग्रहो को लेकर गांगेय वर्षी कर चक्र अपनी कक्षा से पूरा करता है। ज्यादा लिखने से लेख बड़ा हो जायेगा, अधिक जानकारी के लिए गांगेय वर्ष पढ़े, साथ ही सूर्य सिद्धांत।

शायद लेखक को हमारे आर्य पर्व पद्धति और आर्य ज्योतिष विज्ञानं का सिद्धांत ज्ञात नहीं मेरी उनसे विनती है की वो एक बार सूर्य सिद्धांत पुस्तक पढ़ कर स्वाध्याय करे व्यर्थ के आक्षेप और टीका टिप्पण्यिो में समय व्यर्थ न करे। यदि हो सके तो क़ुरान से प्रमाणित कर दिखाए की सूर्य अपनी धुरी पर घूमता है ऐसी कोई आयत क़ुरान में निर्देशित की हो ?

13. सूर्य, चन्द्र, तारे आदि पर भी मनुष्य सृष्टि है। (8-73)

समीक्षा : इस पुस्तक में जो लेखक हैं वो शायद अपनी इसी पुस्तक में प्रस्तुत "निवेदन" को खुद नहीं पढ़ पाये हैं, या फिर मुमकिन है की किसी अन्य व्यक्ति से लिखवा दिया हो, क्योंकि इनके इस "निवेदन" में ही जो इन्होने लिखा उसे हम यहाँ दोहराना चाहते हैं देखिये :

यह ब्रह्माण्ड जिसमे हम रहते हैं, अत्यंत विशाल, विस्तृत और अद्भुत है। इसकी विशालता का अंदाजा ……………… इस ब्रह्माण्ड में न जाने कितने आकाशीय पिंड हमारे सूर्य से लाखो गुना बड़े हैं और न जाने कितने सौर मंडल हैं। करोडो सौर मंडलों से बनने वाली एक आकाश गंगा है। जिसमे अरबो खरबो तारे हैं। इस ब्रह्माण्ड में न जाने कितनी करोड़ आकाश गंगाये हैं। …………… हर आकाशीय पिंड गतिमान है। आकाशीय पिंडो की गति में एक नियमबद्धता है, दिन रात के प्रत्यावर्तन में नियमबद्धता है। वनस्पति जगत में नियमबद्धता है। प्राणी जगत में नियमबद्धता है।

कितना विचित्र है यह ब्रह्माण्ड। देखकर आश्चर्य होता है। प्रश्न यह की जहाँ नियम हो क्या वहां नियामक नहीं होना चाहिए ? .... ब्रह्माण्ड की नियमबद्धता इस बात का प्रमाण है की कोई चेतन शक्ति इसका सञ्चालन कर रही है। यहाँ की नियमबद्धता इस बात का भी प्रमाण है की वह परम शक्ति एक है।

...........शेष

ये यहाँ आप सभी पाठको दिखाना इसलिए भी आवश्यक था की इस पुस्तक के लेखक या तो बुद्धिमान हैं या फिर केवल महर्षि के सत्य सिद्धांतो से अनभिज्ञ और पूर्वग्रह से ग्रसित हैं, क्योंकि खुद मान रहे हैं की इतना बड़ा ब्रह्माण्ड है, उसमे करोडो आकाशगंगाये, अनेक पिंड, असंख्य ग्रह आदि, साथ ही नियमबद्धता और एक ही ईश्वर जो चेतन है, तो मेरे लेखक महोदय, महर्षि दयानंद ने भी तो यही सत्यार्थ प्रकाश में बताया है, जब नियम बद्धता है तभी तो इस पृथ्वी जैसे ग्रह पर हम जीवन ले रहे हैं, ऐसे ही अनेको ग्रहो आदि पर जीवन क्यों नहीं होगा ? क्या वो अनेको आकाशगंगा और ग्रह सिर्फ ब्रह्माण्ड को भरने और सजाने का शोपीस मात्र हैं ? क्या बुद्धिमानी की बात है लेखक की खुद ही अपनी निवेदन में सत्य भी लिखता है और फिर महर्षि की बातो पर आक्षेप भी करता है, क्या इसे लेखक का मानसिक दिवालियापन घोषित न किया जाए ?

आइये एक नजर महर्षि दयानंद के उस विचार पर जो सत्यार्थ प्रकाश में लिखा गया :

(प्रश्न) सूर्य चन्द्र और तारे क्या वस्तु हैं और उनमें मनुष्यादि सृष्टि है वा नहीं?

(उत्तर) ये सब भूगोल लोक और इनमें मनुष्यादि प्रजा भी रहती हैं क्योंकि-

एतेषु हीदँ्सर्वं वसुहितमेते हीदँ्सर्वं वासयन्ते तद्यदिदँ्सर्वं वासयन्ते तस्माद्वसव इति।। -शत० का० १४।।

पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, नक्षत्र और सूर्य इन का वसु नाम इसलिये है कि इन्हीं में सब पदार्थ और प्रजा वसती हैं और ये ही सब को वसाते हैं। जिस लिये वास के निवास करने के घर हैं इसलिये इन का नाम वसु है। जब पृथिवी के समान सूर्य चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात् उन में इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्य होंगे? परमेश्वर का कोई भी काम निष्प्रयोजन नहीं होता तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है? इसलिये सर्वत्र मनुष्यादि सृष्टि है।

(प्रश्न) जैसे इस देश में मनुष्यादि सृष्टि की आकृति अवयव हैं वैसे ही अन्य लोकों में होगी वा विपरीत?

(उत्तर) कुछ-कुछ आकृति में भेद होने का सम्भव है। जैसे इस देश में चीने, हबशी और आर्य्यावर्त्त, यूरोप में अवयव और रंग रूप आकृति का भी थोड़ा-थोड़ा भेद होता है इसी प्रकार लोकलोकान्तरों में भी भेद होते हैं। परन्तु जिस जाति की जैसी सृष्टि इस देश में है वैसी जाति ही की सृष्टि अन्य लोकों में भी है। जिस-जिस शरीर के प्रदेश में नेत्रदि अंग हैं उसी-उसी प्रदेश में लोकान्तर में भी उसी जाति के अवयव भी वैसे ही होते हैं। क्योंकि-

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ।। - ऋ० मं० १०। सू० १९०।।

धाता परमात्मा (ने) जिस प्रकार के सूर्य, चन्द्र, द्यौ, भूमि, अन्तरिक्ष और तत्रस्थ सुख विशेष पदार्थ पूर्वकल्प में रचे थे वैसे ही इस कल्प अर्थात् इस सृष्टि में रचे हैं तथा सब लोक लोकान्तरों में भी बनाये गये हैं। भेद किञ्चित्मात्र नहीं होता।

(प्रश्न) जिन वेदों का इस लोक में प्रकाश है उन्हीं का उन लोकों में भी प्रकाश है वा नहीं?

(उत्तर) उन्हीं का है। जैसे एक राजा की राज्यव्यवस्था नीति सब देशों में समान होती है उसी प्रकार परमात्मा राजराजेश्वर की वेदोक्त नीति अपने सृष्टिरूप सब राज्य में एक सी है।

(सत्यार्थ प्रकाश अष्टम समुल्लास)

अब बताओ लेखक महोदय क्या अपना निवेदन ही पुस्तक से हटवा दोगे या महर्षि दयानंद की बात को अपना लोगे, आओ आपको विज्ञानं से भी प्रमाणित करता हु देखो :

“Scientists have been saying for years that nothing could possiblily live on this star's surface, but we've scanned Andross's ships going to and from the star. Only he would be foolhardy as to try to find military benefit in exploring a red dwarf like Solar. It's another situation we need to have you to check out for us Fox. Nothing in the Cornerian armoury can withstand the extreme temperature near the surface of the star, but your Arwings should be able to make it.”
—General Pepper's Flight Log, pg 70

ये खोज पढ़ी सूर्य पर मिलिट्री बेनिफिट और जहाजो का बेडा आदि बनाने की योजना है, पता नहीं लेखक कौन सी दुनिया में जी रहे, खैर अभी नासा की खोज पढ़िए :

WASHINGTON—In an announcement that could forever change the way scientists study the hydrogen-based star, NASA researchers published a comprehensive study today theorizing that the sun may be capable of supporting fire-based lifeforms. “After extensive research, we have reason to believe that the sun may be habitable for fire-based life, including primitive single-flame microbes and more complex ember-like organisms capable of thriving under all manner of burning conditions,” lead investigator Dr. Steven T. Aukerman wrote, noting that the sun’s helium-rich surface of highly charged particles provides the perfect food source for fire-based lifeforms. “With a surface temperature of 10,000 degrees Fahrenheit and frequent eruptions of ionized gases flowing along strong magnetic fields, the sun is the first star we’ve seen with the right conditions to support fire organisms, and we believe there is evidence to support the theory that fire-bacteria, fire-insects, and even tiny fire-fish were once perhaps populous on the sun’s surface.”

ज्यादा जानकारी के लिए लिंक :

http://www.theonion.com/article/scientists-theorize-sun-could-support-fire-based-l-34559

इससे भी ज्यादा जानकारी के लिए बता दू, जितनी भी रिसर्च होती हैं बायोलॉजी में उसमे ये सिद्धांत है की "All life's energy was solar".

ये सिद्धांत है अटल सिद्धांत, इसलिए वेद ज्ञान ही सत्य और परम प्रमाण है, और भी अनेको प्रमाण हैं विज्ञानं से ही पर लेख बढ़ता जाएगा इसलिए विवशता है पर पता नहीं इस पुस्तक के लेखक को वेद ज्ञान और महर्षि दयानंद की विद्वत्ता का बोध कब होगा ?

14. सिर के बाल रखने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है। (10-02)

समीक्षा : लेखक के आक्षेप ही ऐसे हैं की जिनपर केवल हंसी आती है क्योंकि जो पूरा प्रकरण पढ़ लिया होता तो आपको शंका न होती, केवल एक हिस्सा उठा कर सोचो की महर्षि पर आक्षेप सिद्ध हो जायेगा सो संभव नहीं, पहले आपको दिखाते हैं महर्षि ने क्या लिखा है :

ब्राह्मण के सोलहवें, क्षत्रिय के बाईसवें और वैश्य के चौबीसवें वर्ष में केशान्त कर्म और मुण्डन हो जाना चाहिये अर्थात् इस विधि के पश्चात् केवल शिखा को रख के अन्य डाढ़ी मूँछ और शिर के बाल सदा मुंडवाते रहना चाहिये अर्थात् पुनः कभी न रखना और जो शीतप्रधान देश हो तो कामचार है; चाहै जितने केश रक्खे और जो अति उष्ण देश हो तो सब शिखा सहित छेदन करा देना चाहिये क्योंकि शिर में बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है। डाढ़ी मूँछ रखने से भोजन पान अच्छे प्रकार नहीं होता और उच्छिष्ट भी बालों में रह जाता है।।१३।।
(दशम सम्मुलास)

अब देखिये लेखक की पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता की जो ऋषि ने समझाया उसे तो समझे नहीं उलटे अपनी पुस्तक में तथाकथित समीक्षा करने चल पड़े, समझिए ऋषि की बात को,

यदि शीत प्रदेश, यानी जो ठंडा इलाका में रहने वाले लोग हो, तो वो सर के बाल ना कटाये, चाहे बढे बाल ही क्यों न रखे क्योंकि बाल जो होते हैं वो तंतु (फाइबर) पदार्थ से बने होते हैं क्योंकि ये गर्मी उत्पन्न करते हैं इसलिए शीत प्रदेशो में उत्पन्न हुए पशुओ के बाल सामान्य मौसम के देशो में उत्पन्न हुए पशुओ से अधिक पाये जाते हैं, बाल में सबसे ज्यादा कार्बन होता है, जो थर्मल इंसुलेशन उत्पन्न करके गर्मी को सोख्ता है, जिससे सर में पसीना जल्दी नहीं सूखता और उससे अनेक प्रकार के फंगस और बेक्टेरिअ उत्पन्न होते हैं, अभी हाल में की गयी शोध के अनुसार Cutaneous Allodynia ये बीमारी जो माइग्रेन से सम्बंधित है इसी कारण होती है, और जैसे की आप जानते ही हैं की माइग्रेन जो है वो बुद्धि को कमजोर करता है, इससे ऋषि की बात सत्य सिद्ध होती है।

हम लेखक को केवल ऋषि के सत्य सिद्धांत पर खोज करने हेतु आग्रह करेंगे ताकि व्यर्थ के आक्षेप से लेखक अपना और दुसरो का समय बर्बाद न करते जाए।

15. स्वामी दयानंद ने लिखा है कि वेदों का अवतरण ऋषियों की मातृभाषा में न होकर संस्कृत भाषा में हुआ। संस्कृत भाषा उस समय किसी देश अथवा क़ौम की भाषा नहीं थी। कारण यह लिखा है कि अगर ईश्वर किसी देश अथवा क़ौम की भाषा में वेदों का अवतरण करता तो ईश्वर पक्षपाती होता, क्योंकि जिस देश की भाषा में वेदों का अवतरण होता उसको पढ़ने और पढ़ाने में सुगमता और अन्यों को कठिनता होती। (7-89) (7-92)

समीक्षा : यदि इस पुस्तक के लेखक ने कभी भी संस्कृत विद्या को समझने का गंभीर प्रयास किया होता तो शायद महर्षि की इस बात का भी जवाब खुद ही मिल जाता, मगर खेद की लेखक को केवल और केवल आक्षेप करने की ही फुर्सत मिली, स्वाध्याय की नहीं, क्योंकि लेखक को ज्ञात होना चाहिए की वेदो में जो संस्कृत पायी जाती है उसे वैदिक संस्कृत कहते हैं, जो कभी किसी काल में किसी भी देश व समाज की भाषा नहीं रही, क्योंकि इस वैदिक संस्कृत से ही लौकिक संस्कृत का ज्ञान ऋषि मुनि विकसित कर पाये अतः लौकिक संस्कृत ही भारत की भाषा थी लेकिन वैदिक संस्कृत तो सभी भाषाओ की जननी है, ऐसा विचार और मत तो अनेको पश्चिम विज्ञानिको का भी है। शायद लेखक को ज्ञात नहीं, आइये हम ही समझने का प्रयास करते हैं :

“अब हम समझते हैं भाषा का विस्तार किस प्रकार हुआ –

देखिये वेद में वैदिकी वाणी को नित्य कहा है –

तस्मै नूनमभिद्यवे वाचा विरूप नित्यया। (ऋग्वेद 8.75.6)

नित्यया वाचा – अर्थात नित्य वेदरूप वाणी –

यानी की वैदिक संस्कृत यह सब वाणियों (भाषाओ) की अग्र और प्रथम है –

बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्नं (ऋग्वेद 10.71.1)

प्रभु से दी गयी वेदवाणी ही इस सृष्टि के प्रारंभिक शब्द थे। ईश्वर की प्रेरणा से यह वाणी सृष्टि के प्रारम्भ में ऋषियों पर प्रकट होती है।

यज्ञेन वाचः पदवीयमायणतामानवविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्। (ऋग्वेद 10.71.3)”

“प्रभु अग्नि आदि को वेदज्ञान देते हैं इससे अन्य यज्ञीय वृत्तिवाले ऋषियों को यह प्राप्त होती है –

इसी मन्त्र में आगे लिखा है –

इस ही प्रथम, निर्दोष और अग्र वाणी को लेकर लोग बोलने की भाषा का विस्तार करते हैं।

तामाभृत्या व्यदधुः पुरूत्रा तां सप्त रेभा अभी सं नवंते।। (ऋग्वेद 10.71.3)

इस वाणी को ऋषि मानव समाज में प्रचारित करते हैं। यह वेदवाणी सात छन्दो से युक्त है अर्थात २ कान – २ नाक – २ आँख और एक मुख ये सात स्तोता बनकर इसे प्राप्त करते हैं – उपरोक्त प्रमाणों और तथ्यों से सिद्ध होता है की मनुष्य की एक ही भाषा थी – और मनुष्यो ने इसी वेद वाणी से अर्थात प्रथम व पूर्ण भाषा संस्कृत से – अपूर्ण भाषाए – अर्थात जितनी भाषाए आज प्रचलित हैं उनका निर्माण किया – लेकिन वैदिक संस्कृत में आज भी कोई फेर बदल नहीं हो सका – क्योंकि वैदिक संस्कृत पूर्ण भाषा है –”

अब यहाँ सोचने वाली बात है की अलक़ुरआन एक संयुक्त शब्द है जो अरबी के दो शब्दों से बना है, एक "अल" जिसका अर्थ है "विशेष" दूसरा "कुरान" जो "किरतैअन" धातु से निकला है जिसका अर्थ "पढ़ना" है अतः अलक़ुरआन का अर्थ हुआ वह जो लेख विशेष प्रकार से पढ़ा जाये। इस से सिद्ध हुआ की अलक़ुरआन भी लिखी हुई पुस्तक का नाम है न की ईश्वर के ज्ञान का। तो हमारे लेखक बंधू इस तथ्य पर कब शंका प्रकट कर रहे हैं की क़ुरआन केवल पढ़ने के लिए है, ज्ञान के लिए नहीं ?

जबकि "वेद" "विद्" ज्ञाने धातु से निकला है। वेद का अर्थ है "ज्ञान"। यह किसी लेख वा पुस्तक का नाम नहीं प्रत्युत उस ज्ञान का नाम है जो परमात्मा ने मनुष्यो के कल्याणार्थ प्रकाशित किया है।

अतः इतने से सिद्ध है की महर्षि दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित वेदो और आर्ष साहित्यो का ज्ञान विज्ञानं सत्य पर आधारित है, हम लेखक के पहले अध्याय में मौजूद कुछ और आक्षेपों के भी विज्ञानसम्मत जवाब देंगे।

आओ लौटो वेदो की और

नमस्ते।

सतीश चंद गुप्ता द्वारा उठाये पहले अध्याय के 6-10 / 15 पॉइंट का जवाब ...... पार्ट 3


पिछली पोस्ट में सतीश चंद गुप्ता जी द्वारा लिखित पुस्तक के पहले अध्याय में उठाये 15 पॉइंट में से 5 के जवाब दिए गए अब गत लेख से आगे बढ़ते हुए 6 से 10 पॉइंट तक के जवाब इस लेख के माध्यम से देने का प्रयास किया जाएगा।

6. मांस खाना जघन्य अपराध है। मांसाहारियों के हाथ का खाने में आर्यों को भी यह पाप लगता है। पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा। (10-11 से 15)

समीक्षा : लेखक की इस समीक्षा का जवाब देने से पहले हम बता दे की ये पॉइंट भी "पुनरक्ति दोष" में आता है, क्योंकि लेखक की पुस्तक में "जीव हत्या और मांसाहार" - अहिंसा परमो धर्मः" और "शाकाहार का प्रोपेगंडा" ये तीन अध्याय मांस भक्षण पर ही आधारित है तब पहले अध्याय में भी इस पॉइंट को जताना और फिर तीन अध्याय एक ही विषय पर बनाने, ये कोई विद्वान लेखक का काम तो हो नहीं सकता, शायद इसी कारण से लेखक महर्षि दयानंद की सत्यार्थ प्रकाश समझ भी न सका और समीक्षाओं का समीक्षा कर डाली,

खैर पॉइंट बनाया है तो इस पॉइंट का जवाब भी शार्ट में ही दिया जाएगा, क्योंकि हम अपने लेखन में "पुनरक्ति दोष" नहीं चाहेंगे। विस्तार से जवाब सम्बंधित विषय के अध्याय में दिया जायेगा।

इस पॉइंट का जवाब देने के लिए हम क़ुरान की कुछ आयते प्रकट करना चाहते हैं देखिये :

और धरती पर चलने वाले सब के सब जानवर तथा अपने दोनों पंखो से उड़ने वाले पक्षी तुम्हारी तरह की जमाते (दल) हैं। (क़ुरान ६:३८)

इस आयात में बताया की जैसे मनुष्य हैं वैसे ही हमारी तरह पशु पक्षी भी हैं।

क्या तू देखता नहीं की अल्लाह वह है की जो कोई आसमानो और जमीन में निवास करते हैं सब उसी का गुण-गान करते हैं और उसी के सामने पक्षी पंक्तिबद्ध हो कर उपस्थित हैं। उनमे से प्रत्येक (अपने प्राकृतिक स्वाभाव के अनुसार) अपनी उपासना एवं अपने स्तुति गान को जानता है ……………
(क़ुरान २४:४२)

इस आयत में बताया जैसे मुस्लिम बंधू नमाज करते हैं वैसे ही प्रत्येक पशु पक्षी अपनी अपनी भाषा में उस ईश्वर की उपासना करते हैं यानी वो पशु पक्षी भी मुस्लिम हैं। यदि ऐसा कहो की प्रत्येक माँसाहारी पशु शाकाहारी पशु को अपना भोजन बनाता है, तो यहाँ ये समझने वाली बात होगी की यदि हम भी खुद को पशु मान ले तब तो हमें किसी अन्य पशु को खाने में कोई बुराई न दिखेगी, मगर हम अपने को पशु समझते हैं ? हम तो मनुष्य हैं जो अल्लाह की बनाई सर्वोत्कृष्ट रचना है तो क्या हम अपनी बुद्धि उपयोग न करे ? या केवल पशु के मांस खाने के चक्कर में अपनी जीभ लोलुपता से मनुष्य होते हुए भी पशु से भी निम्न दर्जे के जाकर हैवान बनकर मांसभक्षण करे ?

क्या ये मनुष्यता होगी ?

अथवा मुहम्मद साहब की सिखाई तालीम की पशुओ की सेवा करो, पशुओ को ना मारो, आदि उत्तम बातो का ग्रहण कर वेद धर्म का पालन कर मनुष्य बने रहे।

और हमने धरती को सारी मखलूक के भले के लिए बनाया है।
(क़ुरान ५५:११)

जैसे मनुष्यो है वैसे ही पशु पक्षी भी हैं और सभी मखलूक के जीने का अधिकार अल्लाह ने दिया है , उनके भले के लिए धरती बनाई है तब कैसे किसी मनुष्य को किसी पशु अथवा पक्षी की जान लेने का अधिकार मिला ? क्यों वो किसी पशु पक्षी की जिंदगी लेकर अपनी भूख मिटाता है ? क्या अल्लाह यही चाहता है या मुहम्मद साहब ने ऐसा आदेश किया है ?

आइये हदीस से दिखाते हैं मुहम्मद साहब ने क्या निर्देश किया है :

अबु हुरैरा ने बताया की रसूल से कुछ लोगो ने पूछा की क्या पशुओ की सेवा सुश्रुवा करने से हमें प्रतिफल (इनाम) मिलेगा ?

रसूल ने कहा हाँ, किसी भी पशु पक्षी व जीवित प्राणी की सेवा करने से प्रतिफल (इनाम) मिलता है, ऐसी सेवा करने वाले मनुष्यो को अल्लाह धन्यवाद देता है और उनके पाप माफ़ करता है।

Reference : Sahih al-Bukhari 6009
In-book reference : Book 78, Hadith 40
USC-MSA web (English) reference : Vol. 8, Book 73, Hadith 38

अब बताओ, लेखक महोदय क्या अब भी अल्लाह, क़ुरान और रसूल की इतनी दयापूर्ण बातो को नकार कर, केवल जीभ के स्वाद के लिए पशुओ की निर्दयता से हत्या करकर अपना पेट भरना चाहोगे ?

जब क़ुरान भी पशु पक्षियों को मनुष्यो की जमात मानता है, उन्हें भी धरती पर रहने का सामान अधिकार अल्लाह और क़ुरान देता है, मुहम्मद साहब पशु पक्षियों को बेजबान मानकर उनकी सेवा करने को उम्दा कर्म बताते हैं, और तो और पशु पक्षियों को अल्लाह ने नमाज़ पढ़ने वाला मुस्लिम तक मान
लिया तब भी क्या एक मुस्लिम दूसरे मुस्लिम का क़त्ल कर उसे खा कर पेट भरे तो उसे पाप नहीं तो क्या लेखक महोदय पुण्य का कार्य कहेंगे ?

The Holy Prophet(s) used to say: "Whoever is kind to the creatures of God, is kind to himself." (Wisdom of Prophet Mohammad(s); Muhammad Amin; The Lion Press, Lahore, Pakistan; 1945).

इसे पढ़िए और समझिए - मुहम्मद साहब जो इतने बड़े और महान पशु पक्षी प्रेमी थे जो सभी पशु पक्षियों मनुष्यो में एक ही जीव देखते थे, जो दयालुता के पैरोकार थे, कृपया उनके नाम पर जीव-हत्या करके खाना और पाप न मानना उलटे महर्षि दयानंद जी पर आक्षेप कर देना जो क़ुरान और मुहम्मद साहब की कही सत्य बात "जीव हत्या पाप" के सन्दर्भ में ही लेखक का शंका और सवाल उठा देना ये कोई विद्वान मनुष्य का कार्य नहीं हो सकता।

7. मुर्दों को गाड़ना बुरा है क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देते हैं। (13-41, 42)

समीक्षा : यहाँ इस विषय पर केवल शार्ट में प्रकाश डाला जा रहा है ताकि विस्तार से सम्बंधित विषय पर आधारित अध्याय में बताया जा सके। देखिये कोई भी जीव चाहे मनुष्य हो अथवा पशु व पक्षी मरते ही हैं और शरीर से आत्मा का वियोग होने पर वह शरीर रोगाणुओं और जीवाणुओ का घर बन जाता है जो सड़ता है, क्योंकि शरीर में मौजूद जो मिक्रोजियम्स हैं वह शरीर को अंदर से सडाना स्टार्ट करते हैं जिससे मृत शरीर का pH बैलेंस बिगड़ता है और अति दुर्गन्ध बदबू आनी स्टार्ट हो जाती है, जब यह मृत शरीर जमीन में गाड़ा जाता है तब pH बैलेंस बहुत अधिक हो जाता है और प्राकृतिक रूप शरीर के "गुड न्यूट्रिएंट्स" बाहर नहीं निकल पाते जिससे जमीन के अंदर ही विकार उत्पन्न होता है और अधिक बदबू आती है।

इसका एक दूसरा पहलु और भी है इस तरह के मृत शरीर को दफनाए जाने से जमीन में सोडियम की मात्रा २०० से २००० गुना अधिक तक बढ़ जाती है जिससे पेड़ पौधों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

तीसरा महत्वपूर्ण कारण है की मृत शरीर को दफनाने पर जमीन में अनेक तरह के बेक्टेरिआ और जानलेवा टॉक्सिन्स का निर्माण होने लगता है, अधिकतर पशुओ को जमीन में दफनाने से एक खतरनाक टोक्सिन botulinum टोक्सिन उत्पन्न होता है जो धरती में मौजूद पानी को विषैला करता जाता है जिससे कैंसर और अनेक प्रकार की भयंकर बीमारिया उत्पन्न होती हैं।

अब आप लोग खुद भी सोचिये की क़ुरान में कहीं भी मृत शरीर को दफनाने का वर्णन मिलता भी नहीं है, तो क्यों व्यर्थ ही शरीर को दफनाया जाता है ? क्या लेखक कोई आयत क़ुरान में से दे सकते हैं जो मृत शरीर को दफनाने के लिए अल्लाह ने नाजिल की हो ?

8. लघुशंका के पश्चात् कुछ मुत्रांश कपड़ों में न लगे, इसलिए ख़तना कराना बुरा है। (13-31)

समीक्षा : लेखक ने ऋषि की क़ुरान पर की गयी समीक्षाओं पर अपनी इतनी व्यर्थ समीक्षाएं की हैं की वे शायद भूल गए की खतना करना खुद क़ुरान का आदेश नहीं है, पूरी क़ुरान में कहीं भी अल्लाह ने खतना का आदेश नहीं दिया, जब क़ुरान खुद खतना का आदेश नहीं करती तब लेखक को इसके फायदे व नुकसान का अंदाजा नहीं हो सकता, क्योंकि अल्लाह सर्वज्ञ है इसलिए उसने क़ुरान में खतना का आदेश नहीं किया क्योंकि वो जानता है की खतना करना वैज्ञानिक नहीं। क्योंकि ऋषि की बात जायज़ है, यदि अल्लाह खतना का आदेश करता तो पहले ही मनुष्य को खतना करके भेजता लेकिन ऐसा नहीं किया इसके विपरीत लेखक ने खुदाई काम यानि मानव शरीर से छेड़छाड़ और क़ुरान की शिक्षा पर ही आक्षेप किया है, देखिये :

(यह सभी गवाहियाँ बताती हैं की) निसंदेह हम ने मानव को अच्छी से अच्छी अवस्था में पैदा किया है।
(क़ुरान 95:4)

और हमने मनुष्य को गीली मिटटी के सत से बनाया। (१३)

फिर उसे एक ठहरने वाले स्थान में वीर्य के रूप में रखा। (१४)

फिर वीर्य को प्रगति देकर ऐसा रूप प्रदान किया की वह चिपकने वाला एक पदार्थ बन गया, फिर उस चिपकने वाले पदार्थ को मांस की एक बोटी बना दिया, फिर हमने इसके बाद उस बोटी को हड्डियों के रूप में बदल दिया, फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढ़ाया। फिर उसे एक और रूप में बदल दिया। अतः बड़ी बरकत वाला है वह अल्लाह जो सब से अच्छा पैदा करने वाला है। (१५)

(क़ुरान २३:१३-१५)

जिस ने जो कुछ भी पैदा किया है सर्वोत्तम शक्तियों से पैदा किया है और मनुष्य को गीली मिटटी से पैदा किया है। (८)

फिर उसे पूर्ण शक्तिया प्रदान की और उसमे अपनी और से आत्मा डाली तथा तुम्हारे लिए कान, आँख और दिल बनाये, परन्तु तुम लेश मात्र भी धन्यवाद नहीं करते। (१०)

(क़ुरान ३२:८-१०)

अतः तू अपना सारा ध्यान धर्म में लगा दे, इस प्रकार की तुम में कोई टेढ़ापन न हो। तू अल्लाह के पैदा किये हुए प्राकृतिक स्वाभाव को अपना, (वह प्राकृतिक स्वाभाव) जो अल्लाह ने लोगो में पैदा किया है। अल्लाह की रचना में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। यही कायम रहने वाला धर्म है, किन्तु बहुत से लोग जानते नहीं।

(क़ुरान ३०:३०)

उपरोक्त आयतो पर ध्यान से पढ़ने पर ज्ञात होता है की क़ुरान में अल्लाह ने स्पष्ट रूप से बता दिया है की अल्लाह ने मनुष्य को पूर्ण, उत्तम और सबसे बेहतर शरीर के साथ बनाया है, साथ ही अल्लाह ने बता दिया की उसकी बनाई संरचना में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता, न ही कोई करेगा, जो ऐसा कार्य करता है वह धर्म का कार्य नहीं हो सकता क्योंकि अल्लाह ने क़ुरान में ही कहा है :

इसी प्रकार उन लोगो को मूर्खता पूर्ण बातो की और बहका कर ले जाया जाता है जो अल्लाह की आयतो का हठ से इंकार करते हैं। (६४)

क़ुरान ४०:६४)

अब शायद लेखक को समझ आ जाना चाहिए की अल्लाह की बनाई सम्पूर्ण और सर्वोत्कृष्ट रचना जिसमे कोई खोट नहीं उसमे जबरदस्ती खतना करवाना न तो विज्ञानं पूर्ण कोई तथ्य है न ही क़ुरान का आदेश बल्कि अल्लाह की अवज्ञा करना ही सिद्ध होता है जिसे क़ुरान में मूर्खतापूर्ण बातो की और बहकाना या फिर शैतान का काम कहा जा सकता है।

अतः जो काम मात्र कुछ सेकंड में पानी से धोकर साफ़ किया जा सकता है , उसके लिए खतना करवाना क़ुरान अनुसार ठीक विदित नहीं होता। अतः ऋषि का कथन युक्तियुक्त है। इस विषय पर विस्तार से लेख भी लिखा जाएगा ताकि जो मिथक लेखक ने एड्स से बचाव के दिए हैं उनका खंडन आप सबको विदित होगा। अब लेखक बताये की वो क्यों क़ुरान के खिलाफ जाकर खतना करवाने की सलाह दे रहे हैं ?

9. दंड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधर पर होना चाहिए। (6-27)

समीक्षा : लेखक शायद समीक्षा करने में ये बात भूल गए की ऋषि ने कितनी उत्तम दंड विधान की और इशारा किया है, शायद लेखक केवल पूर्वाग्रह का शिकार है जो ऋषि की इतनी महान सोच को भी न समझ पाया देखिये :

जिस अपराध में साधारण मनुष्य पर एक पैसा दण्ड हो उसी अपराध में राजा को सहस्र पैसा दण्ड होवे अर्थात् साधारण मनुष्य से राजा को सहस्र गुणा दण्ड होना चाहिये। मन्त्री अर्थात् राजा के दीवान को आठ सौ गुणा उससे न्यून सात सौ गुणा और उस से भी न्यून को छः सौ गुणा इसी प्रकार उत्तर-उत्तर अर्थात् जो एक छोटे से छोटा भृत्य अर्थात् चपरासी है उस को आठ गुणे दण्ड से कम न होना चाहिये। क्योंकि यदि प्रजापुरुषों से राजपुरुषों को अधिक दण्ड न होवे तो राजपुरुष प्रजा पुरुषों का नाश कर देवे, जैसे सिह अधिक और बकरी थोड़े दण्ड से ही वश में आ जाती है। इसलिये राजा से लेकर छोटे से छोटे भृत्य पर्य्यन्त राजपुरुषों को अपराध में प्रजापुरुषों से अधिक दण्ड होना चाहिये।।३।।

वैसे ही जो कुछ विवेकी होकर चोरी करे उस शूद्र को चोरी से आठ गुणा, वैश्य को सोलह गुणा, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा।।४।।

ब्राह्मण को चौसठ गुणा वा सौ गुणा अथवा एक सौ अट्ठाईस गुणा दण्ड होना चाहिये अर्थात् जितना जितना ज्ञान और जितनी प्रतिष्ठा अधिक हो उस को अपराध में उतना हीे अधिक दण्ड होना चाहिए।।५।।

राज्य का अधिकारी धर्म्म और ऐश्वर्य की इच्छा करने वाला राजा बलात्कार काम करने वाले डाकुओं को दण्ड देने में एक क्षण भी देर न करे।।६।।

(षष्ठम समुल्लास)

अब सोचिये ऐसी महान विचारधारा और दण्डव्यवस्था केवल वैदिक धर्म में ही मिल सकती है और महर्षि दयानंद जैसे आप्त पुरुष ही इसका उद्घोष कर सकते हैं तथा वैदिक जनता ही मान्य करेगी। क्योंकि लेखक को तो इसमें भी दोष नजर आ रहा है।

आप खुद सोचिये यदि कोई जज गलत निर्णय से किसी सामान्य निरपराध पुरुष को सजा देवे तो क्या ऐसे निर्णयकारी जज को सामान्य से अधिक दंड नहीं मिलना चाहिए ? बिलकुल तर्कपूर्ण और सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाली दण्डव्यवस्था है लेकिन क्या क़ुरान ऐसी व्यवस्था देती है ? क्या लेखक बताएँगे ऐसी समृद्ध और तर्कपूर्ण दण्डव्यवस्था का विवरण क़ुरान या अन्य किसी धर्म ग्रन्थ के आधार पर ?

10. ईश्वर के न्याय में क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता । (14-105)

समीक्षा : लेखक ने ऋषि के क़ुरान पर उठाये आक्षेपों की समीक्षा में ईश्वर की न्यायवेवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए, क्या ऐसे लेखन और सोच को बुद्धिमानी के स्तर पर कुछ अंक दिए जा सकते हैं ? नित दैनिक रूप से हम देखते हैं की हमें क्षण प्रतिक्षण सुख दुःख आदि का अनुभव होता है, प्रत्येक क्षण में हम सुखी व दुखी अनुभव करते हैं क्या ये सुख दुःख हमें कर्मो के आधार पर प्रत्येक क्षण में प्राप्त नहीं हो रहा ?

क्या ये दुःख सुख जो हम जीवन के प्रत्येक क्षण में अनुभव करते हैं ये ईश्वर की न्यायवेवस्था नहीं है ? क्या लेखक को ये सुख दुःख अनुभव नहीं होते ? इस आक्षेप पर इससे अधिक और क्या लिख सकते हैं जबकि लेखक केवल पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर ईश्वर की न्यायकारी व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगा रहा हो ? शायद क़ुरान की "अंतिम दिन" वाली न्यायकारी व्यवस्था से लेखक पूर्ण सहमत है, मगर हम लेखक से ही पूछना चाहेंगे यदि अंतिम दिन ही सबका न्याय होगा तो फिर जो प्रत्येक जीव जीवन के हर क्षण में सुख दुःख अनुभव कर रहा वो किस प्रभाव के कारण ? क्योंकि लेखक शायद पूर्वजन्मों का फल तो मानता नहीं तो जब पुर्जन्मों का फल नहीं तो आपके किये इसी जन्म के कर्म फल अनुसार आपको हर क्षण सुख दुःख अनुभव हो रहे हैं तब "अंतिम दिन" न्याय होगा ये वयवस्था तो ठप हो गयी।

तो अब लेखक बताये यदि वो पूर्वजन्म भी नहीं मानते और केवल अंतिम दिन ही न्याय होने पर विश्वास करते हैं तो जो हर क्षण में सुख दुःख अनुभव हो रहा वो किस कारण ?

लेख बहुत बड़ा हो गया और अभी और भी लिखते गए तो बहुत बढ़ जाएगा इससे पाठकगण इतने से ही समझ जायेंगे बाकी आगे के लेख में लेखक के उठाये १०-१५ पॉइंट के जवाब दिए जायेंगे।

लौटो वेदो की और।

नमस्ते।
 —

सतीश चंद गुप्ता द्वारा उठाये पहले अध्याय के 5 / 15 पॉइंट का जवाब ...... पार्ट 2

जैसे की पिछली पोस्ट को आपने पढ़ा, उस पोस्ट में महर्षि दयानंद द्वारा की गयी क़ुरान पर समीक्षाओं और निर्देशो पर सतीश चंद गुप्ता जी द्वारा अपनी ही समीक्षाएं प्रस्तुत की गयी जो किसी भी प्रकार ठीक विदित नहीं होती क्योंकि जो उन्होंने समीक्षाएं की वो समीक्षा कम पूर्वाग्रह द्वारा उठाये गए सवाल ज्यादा मालूम होते हैं क्योंकि बिना पूरा प्रकरण समझे और ऋषि के सत्य सिद्धांत वाली बात को परखे अनजाने में ही शायद समीक्ष्याये की गयी होंगी, क्योंकि ऐसा चतुर विद्वान मेने आज तक नहीं देखा जो एक महर्षि द्वारा रचित सत्य सिद्धांतो पर आधारित पुस्तक पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देवे ?

ये भी हो सकता है की सतीश चंद गुप्ता जी ऋषि की बातो को पूर्ण अर्थ में न समझ सके हो क्योंकि ऋषि ने वेद और आर्ष ग्रंथो को ही मान्य किया लेकिन शायद लेखक सत्य सिद्धांतो की अपेक्षा किसी मत व सम्प्रदाय के पक्ष में ज्यादा झुकाव महसूस करता हो इसलिए ऐसा दोषारोपण करने का प्रयास किया हो, खैर जो भी हो हम पूरी कोशिश करेंगे की लेखक द्वारा उठाई गयी शंकाओ पर अपना मत प्रकट करे ताकि सत्य असत्य का निराकरण होने से ऋषि के सत्य सिद्धांतो की बाते लेखक को समझ आये।

ऐसे ही पहले अध्याय में 15 आक्षेप (समीक्षाएं) की गयी हैं जिनका क्रमगत जवाब इस लेख में दिया जायेगा।

1. प्रसूता छह दिन के पश्चात बच्चे को दूध न पिलाये।

समीक्षा : अब देखिये लेखक ने ऋषि की बात को न समझकर क्या से क्या लिख दिया, ऋषि ने जो लिखा वो देखिये :

"ऐसा पदार्थ उस की माता वा धायी खावे कि जिस से दूध में भी उत्तम गुण प्राप्त हों। प्रसूता का दूध छः दिन तक बालक को पिलावे। पश्चात् धायी पिलाया करे परन्तु धायी को उत्तम पदार्थों का खान पान माता-पिता करावें। जो कोई दरिद्र हो, धायी को न रख सके तो वे गाय वा बकरी के दूध में उत्तम औषधि जो कि बुद्धि, पराक्रम, आरोग्य करने हारी हों उनको शुद्ध जल में भिजा, औटा, छान के दूध के समान जल मिलाके बालक को पिलावें।" (द्वित्य समुल्लास)

अब देखिये ऋषि ने कहीं लिखा की प्रसूता ६ दिन बाद बच्चे को दूध न पिलाये, बल्कि व्यवस्था बताई है की धाई जो उत्तम पदार्थो का खान पान करवाकर उसका दूध बच्चे को पिलावे, अथवा निर्धन हो तो गाय, व बकरी के दूध में औषधि साथ में थोड़ी जल की मात्रा भी बच्चे को पिलाये। क्योंकि शिशु का पाचन कमजोर होता है इसलिए थोड़ा जल मिलाने का विधान किया है।

दूसरी बात यदि लेखक का कहना ये है की प्रसूता यानी माता का दूध बच्चे को न पिलाये तो उसके लिए भी ऋषि ने प्रथम ६ दिन तक माता को बच्चे को दूध पिलाने की बात लिखी है उसके पीछे की वैज्ञानिक बात देखिये :

माता के दूध में जो गुण होता है जिससे बच्चा स्वस्थ, निरोगी और बुद्धिमान बनता है उसे "कोलोस्ट्रम" कहते हैं, ये एक प्रकार से माता के शरीर में दूध ही होता है, जो पहले २४ घंटे में बहुत गाढ़ा, और पीला रंग का निकलता है जिसे बच्चे को पिलाना बेहद जरुरी है, २-४ दिन बाद ये हल्का पीला दूध होता जाता है और ८वे दिन ये पीला रंग यानी "कोलोस्ट्रम" सामान्य लेवल पर आ जाता है। यानी दूध का रंग और गुण दोनों ही सामान्य हो जाते हैं, और जो शुरूआती ६ दिन का गुणवर्धक और बलवर्धक औषधि सामान दूध है वो तो महर्षि ने प्रसूता द्वारा शिशु को पिलाने का विधान ऋषि ने आर्ष ग्रंथो के आधार पर कर ही दिया है।

हालांकि मेडिकल स्टडीज बताती हैं की ६ महीने तक दूध पिलाना चाहिए, लेकिन ऋषि ने जिस महत्वपूर्ण बात की और निर्देश दिया है वो समझने वाला है देखिये :

"क्योंकि प्रसूता स्त्री के शरीर के अंश से बालक का शरीर होता है, इसी से स्त्री प्रसव समय निर्बल हो जाती है इसलिये प्रसूता स्त्री दूध न पिलावे। दूध रोकने के लिये स्तन के छिद्र पर उस ओषधी का लेप करे जिससे दूध स्रवित न हो।" (द्वित्य समुल्लास)

इसलिए क्योंकि स्त्री प्रसव बाद बेहद कमजोर हो जाती है, अतः जितना स्त्री और शिशु की देखभाल और सुरक्षा की जाए वह उत्तम ही है। बाकी तो धायी भी स्तन पान करवाये तो उत्तम उत्तम पदार्थ उसके भक्ष्य हेतु हो, व निर्धन होने पर गाय व बकरी के दूध में उत्तम औषधि से शिशु का लालन हो तो भी श्रेयस्कर है।

2. 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरूष का विवाह उत्तम है अर्थात् स्वामी जी के मतानुसार लड़के की उम्र लड़की से दूना या ढाई गुना होनी चाहिए। (3-31) (4-20) (14-143)

समीक्षा : अब देखिये हमारे विद्वान बंधू गुप्ता जी का स्वाध्याय जो कभी शरीर शास्त्र पढ़ लिया होता तो ऋषि की बात का यु छोटा सा अंश लेकर समीक्षा न करते, देखिये ऋषि ने क्या लिखा है :

इस शरीर की चार अवस्था हैं। एक (वृद्धि) जो १६वें वर्ष से लेके २५वें वर्ष पर्यन्त सब धातुओं की बढ़ती होती है। दूसरा (यौवन) जो २५ वें वर्ष के अन्त और २६वें वर्ष के आदि में युवावस्था का आरम्भ होता है। तीसरी (सम्पूर्णता) जो पच्चीसवें वर्ष से लेके चालीसवें वर्ष पर्यन्त सब धातुओं की पुष्टि होती है। चौथी (किि ञ्चत्परिहाणि) तब सब सांगोपांग शरीरस्थ सकल धातु पुष्ट होके पूर्णता को प्राप्त होते हैं। तदनन्तर जो धातु बढ़ता है वह शरीर में नहीं रहता, किन्तु स्वप्न, प्रस्वेदादि द्वारा बाहर निकल जाता है वही ४० वां वर्ष उत्तम समय विवाह का है अर्थात् उत्तमोत्तम तो अड़तालीसवें वर्ष में विवाह करना।

आज विज्ञानं सम्मत है, ये चार चरण, बाल्यावस्था, युवावस्था, परिपक्व और वृद्ध ये चार अवस्थाये हैं, ऋषि ने यही समझाने का प्रयास किया है, विज्ञानं भी मानता है की स्त्री का शरीर कम से कम 16-18 वर्ष का होना ही चाहिए और पुरुष का कम से कम 25 वर्ष। अधिक से अधिक विवाह योग्य आयु का ऋषि ने विधान दिया है क्योंकि इस अवस्था में शरीर परिपक्व और बुद्धि मच्योर होती है।

यूके में स्थित नई केस्टल यूनिवर्सिटी के विज्ञानिको द्वारा की गयी शोध से प्रमाणित हुआ की महिलाये पुरुषो के मुकाबले जल्दी यहाँ तक की बहुत जल्दी परिपक्व होती हैं वहीँ "दी नई यॉर्क टाइम्स" में पिछले साल दिसम्बर २०१४ में छपी खबर के मुताबिक ३२ वर्ष की उम्र में विवाह हुए पुरुषो की शादी कम उम्र में हुई शादियों के मुताबिक बेहतर रिजल्ट देती है।

3. गर्भ स्थिति का निश्चय होने पर एक वर्ष तक स्त्री-पुरुष का समागम नहीं होना चाहिए। (2-2) (4-65)

समीक्षा : हमारे शंकाकर्ता बंधू गुप्ता जी शायद समीक्षा करने हेतु ये भूल गए की विवाह का दायित्व संतानोत्पत्ति के साथ साथ अपनी जीवनसंगनी का स्वास्थय और शरीररक्षा भी होती है, शायद हमारे बंधू यौनसुख को ज्यादा महत्त्व देने के कारण ये बुनियादी नियम भी भूल गए की यौन सुख महज कुछ मिनट का होता है जबकि इस यौन सुख के कारण यदि भ्रूण या गर्भ में इस यौनकर्षण के द्वारा कुछ अकस्मात् गंभीर हो गया तो ये बेहद गलत बात होगी। क्योंकि गर्भ में भ्रूण बनने के बाद यदि यौन क्रिया करते रहे तो इससे गर्भ में मौजूद शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऋषि ने ये बात इसलिए भी लिखा है ताकि ब्रह्मचर्य को जीवन में अपनाया जाए, क्योंकि सभी जानते हैं वीर्य की रक्षा जीवन की रक्षा है। अब जो लोग यौनसुख के अभिलाषी हैं उनको ब्रह्मचर्य जल्दी समझ नहीं आ सकता। ये बहुत शोध और समझने का विषय है।

4. जब पति अथवा स्त्री संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हों तो वह पुरूष अथवा स्त्री नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकते हैं। (4-122 से 149)

समीक्षा : हमारे शंकाकर्ता बंधू शायद भूल गए की यदि जिसके संतान न हो पाती हो तो उसके पास दो उपाय होते हैं, 1. संतान गोद लेना अथवा नियोग जिसे आज के समय में IVR के नाम से भी जाना जाता है। इस विषय पर विस्तार से आगे के अध्याय में लिखा जायेगा।

5. यज्ञ और हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है। (4-93)

समीक्षा : हमारे शंकाकर्ता बंधू गुप्ता जी शायद विज्ञानं और रासायनिक क्रिया को भूल गए, क्योंकि वेद और आर्ष साहित्य को ठीक ढंग से न पढ़ पाने के यही परिणाम होता है, खैर गुप्ता जी ये देखिये आधुनिक विज्ञानं के अनुसार सूर्य की धुप क्षयरोग के लिए बचाव और उपचार दोनों है
http://www.dailymail.co.uk/…/Sunshine-vitamin-helps-treat-p…
अब इस समय पर यज्ञ करना लाभदायक ही होगा क्योंकि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में मुख्य रूप से गौघृत, खांड अथवा शक्कर, मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फल जिनमे शक्कर अधिक होती है, चावल, केसर और कपूर आदि के संतुलित मिश्रण से बनी होती है।
अब इस विषय पर कुछ वैज्ञानिको के विचार :

१. फ्रांस के विज्ञानवेत्ता ट्रिलवर्ट कहते हैं : जलती हुई शक्कर में वायु - शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति होती है। इससे क्षय, चेचक, हैजा आदि रोग तुरंत नष्ट हो जाते हैं।

२. डॉक्टर एम टैल्ट्र ने मुनक्का, किशमिश आदि सूखे फलो को जलाकर देखा है। वे इस निर्णय पर पहुंचे हैं की इनके धुंए में टायफाइड ज्वर के रोगकीट केवल तीस मिनट तथा दूसरी व्याधियों के रोगाणु घंटे - दो घंटे में मर जाते हैं।

३. प्लेग के दिनों में अब भी गंधक जलाई जाती है, क्योंकि इसमें रोगकीट नष्ट होते हैं। अंग्रेजी शासनकाल में डाकटर करनल किंग, आई एम एस, मद्रास के सेनेटरी कमिश्नर थे। उनके समय में वहां प्लेग फ़ैल गया। तब १५ मार्च १८९८ को मद्रास विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के समक्ष भाषण देते हुए उन्होंने कहा था - "घी और चावल में केसर मिलकर अग्नि में जलाने से प्लेग से बचा जा सकता है।" इस भाषण का सार श्री हैफकिन ने "ब्यूबॉनिक प्लेग" नामक पुस्तक मे देते हुए लिखा है, "हवन करना लाभदायक और बुद्धिमत्ता की बात है।"

महर्षि दयानंद ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है :

"जब तक इस होम करने का प्रचार रहा ये तब तक ये आर्यवर्त देश रोगो से रहित और सुखो से पूरित था अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाए।"
(स. प्र. तृतीय समुल्लास)

यहाँ ऋषि इसी विज्ञानं को समझाने की कोशिश कर रहे हैं जो आज का आधुनिक विज्ञानं मानता है। इस विषय पर विस्तार से आपको आगे के अध्यायों में बताया जायेगा।

5-5 पॉइंट के हिसाब से लेखक की 15 शंकाओ का जवाब दिया जा रहा है जिस विषय को शार्ट में लिखा है उसका पूरा विस्तार उक्त विषय से सम्बंधित अध्याय में पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने का ध्येय रहेगा। क्योंकि हमारे बंधू गुप्ता जी लेखन को नहीं जानते होंगे इसलिए जो १५ पॉइंट इन्होने पहले अध्याय में उठाये वही १५ पॉइंट पर पूरी किताब बेस है, इसलिए यहाँ जिन पॉइंट को विस्तार से बताया उनका सम्बन्ध आगे की अध्याय में नहीं है इसलिए यही सम्पूर्ण बता दिया है, क्योंकि बार बार एक ही विषय को बताते रहने से "पुनरुक्ति दोष" होता है जो हम नहीं चाहते, लेकिन हमारे शंकाकर्ता बंधू की तो पूरी पुस्तक ही इस दोष से युक्त है, क्योंकि जगह जगह एक ही विषय को बार बार व्यर्थ ही घसीटा जा रहा है ताकि इनकी पुस्तक बड़ी हो जाए और ऋषि पर लेखक कुछ आपत्ति दर्ज करवा सके, सो ये तो हो नहीं सका उलटे शायद लेखक पर ही अब कुछ सवाल खड़े हो गए हैं जिनमे प्रमुख है "पुनरुक्ति दोष"

ऋषि के लेखन पर तो लेखक ने व्यर्थ ही सवाल खड़े करे मगर जो इनकी पुस्तक में पुनरुक्ति दोष है उसपर लेखक कब विचार करेंगे ?

सतीश चंद गुप्ता द्वारा की गयी समीक्षा पहले अध्याय का जवाब ...... पार्ट 1

प्यारे मित्रो व बंधुओ, नमस्ते

अभी कुछ दिन से एक पुस्तक पढ़ रहा था "सत्यार्थ प्रकाश : समीक्षा की समीक्षा" जिसके लेखक सतीश चंद गुप्ता हैं, कहने को तो उन्होंने महर्षि दयानंद की क़ुरान पर उठाई आपत्तियों और समीक्षाओं पर अपनी समीक्षाएं करने का दावा किया है मगर ये समीक्षाएं कितनी फिट बैठती हैं ये हम इस लेख में समझने का प्रयास करेंगे। अभी इस लेख में इनकी पुस्तक के पहले अध्याय में महर्षि दयानंद की क़ुरान पर उठाई वाजिब और अनूठी शंकाओ और टिप्पणियों पर इनकी समीक्षाओं का जायजा लेंगे बाकी अगले लेखो में भी इनके द्वारा की गयी समीक्षाओं की व्यवहारिकता और सार्थकता पर भी प्रकाश डालने का पूर्ण प्रयास करेंगे ताकि हमारे बंधू सतीश चंद गुप्ता जी ये न कहे की इन्हे जवाब न मिला। आइये इनकी एक एक समीक्षा को देखे और समझे :

सतीश चंद गुप्ता जी (हमारे बंधू) ये बात स्पष्ट तौर पर स्वयं मानते हैं की ऋषि का ज्ञान जो सत्यार्थ प्रकाश में फैला हुआ है वो लगभग ३००० पुस्तको को पढ़ने के बाद का निचोड़ है, मगर अगले ही पल सत्यार्थ प्रकाश को आर्य समाज की रीढ़ की हड्डी बता दिया, हमारे प्रिय बंधू को शायद ये ज्ञात नहीं है की प्रत्येक आर्य समाजी अथवा हिन्दू भाई की रीढ़ की हड्डी और मान्य धार्मिक ग्रन्थ केवल और केवल "वेद" हैं, महर्षि दयानंद ने भी वेदो और आर्ष ग्रंथो तथा पुराण क़ुरान आदि अनार्ष ग्रंथो के गहन अध्यन पश्चात ही "सत्यार्थ प्रकाश" जैसी अमूल्य निधि का निर्माण किया ताकि समस्त मानव जाति सत्य को जानकार असत्य को त्याग देवे, आर्य समाज भी ऋषि के सत्यार्थ प्रकाश को सत्य असत्य के निर्धारण हेतु पढ़ना और पढ़ाना मानता है बाकी स्वाध्याय तो वेद और अन्य आर्ष ग्रंथो का भी करना चाहिए, सत्यार्थ प्रकाश एक निर्देशिका है जो वेद और आर्ष ग्रंथो तथा प्राचीन ऋषियों मुनियो का जो धर्म के प्रति विचार थे उनका प्रकटीकरण करना और सत्य तथा असत्य के भेद को जानने में सहायता लेना।

धयान देने वाली बात है जब किसी मत या सम्प्रदाय की ऐसी बातो पर ध्यान दिलाया जाए जो मानव समाज के लिए हितकर न हो और उसकी समीक्षा समुचित तर्कपूर्ण आधार पर हो तो उस मत व सम्प्रदाय को थोड़ा बुरा लगना अथवा असहज हो जाना, ये सम्बंधित मत व सम्प्रदाय वाले मनुष्यो का स्वाभाव ही होगा, क्योंकि ऋषि ने सत्यार्थ प्रकाश के भूमिका में ही लिखा है :

"मेरा इस ग्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य-सत्य अर्थ का प्रकाश करना है, अर्थात् जो सत्य है उस को सत्य और जो मिथ्या है उस को मिथ्या ही प्रतिपादन करना सत्य अर्थ का प्रकाश समझा है। वह सत्य नहीं कहाता जो सत्य के स्थान में असत्य और असत्य के स्थान में सत्य का प्रकाश किया जाय। किन्तु जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहाता है। जो मनुष्य पक्षपाती होता है, वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मतवाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है, इसलिए वह सत्य मत को प्राप्त नहीं हो सकता। इसीलिए विद्वान् आप्तों का यही मुख्य काम है कि उपदेश वा लेख द्वारा सब मनुष्यों के सामने सत्याऽसत्य का स्वरूप समर्पित कर दें, पश्चात् वे स्वयम् अपना हिताहित समझ कर सत्यार्थ का ग्रहण और मिथ्यार्थ का परित्याग करके सदा आनन्द में रहें।"

महर्षि का बड़ा ही सरल और सहज भाव था की जो सत्यान्वेषी होकर इस ग्रन्थ को पढ़े तो उसे सत्य को ग्रहण करने में कोई परेशानी न होगी,

"परन्तु इस ग्रन्थ में ऐसी बात नहीं रक्खी है और न किसी का मन दुखाना वा किसी की हानि पर तात्पर्य है, किन्तु जिससे मनुष्य जाति की उन्नति और उपकार हो, सत्याऽसत्य को मनुष्य लोग जान कर सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करें, क्योंकि सत्योपदेश के विना अन्य कोई भी मनुष्य जाति की उन्नति का कारण नहीं है।"

ये महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में ही लिख दिया गया है, पर खेद की जो विद्वान व आप्त लोग जैसे हमारे बंधू सतीश चंद जी महर्षि की उक्त बातो को ठीक से न समझकर केवल पूर्वाग्रह से ही शायद अपनी समीक्षा करते गए।

आइये अब एक एक शंका को देखते हैं की सतीश चंद जी की समीक्षा पर समीक्षा क्या है ?

1. महर्षि को संस्कृत का प्रकांड विद्वान भी मानते हैं और उन्ही महर्षि के द्वारा लिखी गयी समीक्षा को भाषा शैली अनुसार घिनौनी और शर्मनाक भी कहते हैं, पर क्या सच में ऐसा है ? आइये एक नजर डाले :

देखो इन गवर्गण्ड पोपों की लीला : ये शब्द महर्षि ने किस कारण और प्रकरण पर उपयोग किया जरा पूरा देखिये :

"अर्थात् देखो इन गवर्गण्ड पोपों की लीला जो कि वेदविरुद्ध महा अधर्म के काम हैं उन्हीं को श्रेष्ठ वाममर्गियों ने माना। मद्य, मांस, मीन अर्थात् मच्छी, मुद्रा पूरी कचौरी और बड़े रोटी आदि चर्वण, योनि, पात्रधार, मुद्रा और पांचवां मैथुन अर्थात् पुरुष सब शिव और स्त्री सब पार्वती के समान मान कर" (एकादश समुल्लास)

बताइये जो वेद विरुद्ध कर्म हो ऐसे हीन और लज्जामय कर्म को यदि कोई धार्मिक कार्य बतावे तो क्या उसकी बढ़ाई होगी ?

आगे देखिये :

"रक्तबीज के शरीर से एक बिन्दु भूमि में पड़ने से उस के सदृश रक्तबीज के उत्पन्न होने से सब जग्त में रक्तबीज भर जाना, रुधिर की नदी का बह चलना आदि गपोड़े बहुत से लिख रक्खे हैं। जब रक्तबीज से सब जगत् भर गया था तो देवी और देवी का सिह और उस की सेना कहां रही थी? जो कहो कि देवी से दूर-दूर रक्तबीज थे तो सब जगत् रक्तबीज से नहीं भरा था? जो भर जाता तो पशु, पक्षी, मनुष्यादि प्राणी और जलस्थ मगरमच्छ, कच्छप, मत्स्यादि, वनस्पति आदि वृक्ष कहां रहते? यहां यही निश्चित जानना कि दुर्गापाठ बनाने वाले पोप के घर में भाग कर चले गये होंगे!!! देखिये! क्या ही असम्भव कथा का गपोड़ा भंग की लहरी में उड़ाया जिसका ठौर न ठिकाना।" (एकादश समुल्लास)

अब देखिये यहाँ भी सतीश चंद जी ऐसे ही अन्य आक्षेप भी बिना प्रकरण को पूरी तरह से पढ़े केवल पूर्वाग्रह के कारण अपनी समीक्षाओं में लिखते गए यदि पूरी समीक्षाएं इसी प्रकार आपके समक्ष रखता जाउ तो बहुत बड़ा लेख हो जावेगा इसलिए आप एक बार स्वयं भी सत्यार्थ प्रकाश की समीक्षाओं को पढ़कर सतीश चंद जी की समीक्षाओं पर खुद नजर डाले की वो आखिर किस हद तक वाजिब हैं

जबकि महर्षि दयानंद सत्य के कितने बड़े मान्यकर्ता थे वो आपको हम दिखाते हैं :

ऋषि ने जहाँ जहाँ क़ुरान में जो थोड़ा बहुत सत्य पाया है उसपर अपने विचार भी प्रकट किये हैं :

१३७-उतारना किताब का अल्लाह गालिब जानने वाले की ओर से है।। क्षमा करने वाला पापों का और स्वीकार करने वाला तोबाः का।।

-मं० ६। सि० २४। सू० ४०। आ० १। २। ३।।

(समीक्षक) यह बात इसलिये है कि भोले लोग अल्लाह के नाम से इस पुस्तक को मान लेवें कि जिस में थोड़ा सा सत्य छोड़ असत्य भरा है और वह सत्य भी असत्य के साथ मिलकर बिगड़ा सा है। इसीलिये कुरान और कुरान का खुदा और इस को मानने वाले पाप बढ़ाने हारे और पाप करने कराने वाले हैं। क्योंकि पाप का क्षमा करना अत्यन्त अधर्म है। किन्तु इसी से मुसलमान लोग पाप और उपद्रव करने में कम डरते हैं।।१३७।। (चतुर्दश समुल्लास)

"अब इस कुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सम्मुख स्थापित करता हूँ कि यह पुस्तक कैसा है? मुझ से पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान् की बनाई और न विद्या की हो सकती है। यह तो बहुत थोड़ा सा दोष प्रकट किया इसलिये कि लोग धोखे में पड़कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ इस में थोड़ा सा सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझ को ग्राह्य है वैसे अन्य भी मजहब के हठ और पक्षपातरहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्य है।" (चतुर्दश समुल्लास)

७३-मत फिरो पृथिवी पर झगड़ा करते।। -मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ७४।।

(समीक्षक) यह बात तो अच्छी है परन्तु इस से विपरीत दूसरे स्थानों में जिहाद करना काफिरों को मारना भी लिखा है। अब कहो यह पूर्वापर विरुद्ध नहीं है? इस से यह विदित होता है कि जब मुहम्मद साहेब निर्बल हुए होंगे तब उन्होंने यह उपाय रचा होगा और जब सबल हुए होंगे तब झगड़ा मचाया होगा। इसी से ये बातें परस्पर विरुद्ध होने से दोनों सत्य नहीं हैं।।७३।। (चतुर्दश समुल्लास)

उपर्लिखित सभी तथ्यों से ज्ञात हो जाता है की महर्षि दयानंद सत्य के प्रति कितने गंभीर थे, उन्होंने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में केवल सत्य को ग्रहण करवाने हेतु ही पुस्तक का सृजन किया, महर्षि ने अन्य मत मतांतरों, सम्प्रदायों में भी जो जो सत्य देखा उसे अपनी सत्यार्थ प्रकाश में समीक्षा के अंतर्गत लिखा है देखिये :

"और जो आप झूठा और दूसरे को झूठ में चलावे उसको शैतान कहना चाहिये सो यहां शैतान सत्यवादी और इससे उसने उस स्त्री को नहीं बहकाया किन्तु सच कहा और ईश्वर ने आदम और हव्वा से झूठ कहा कि इसके खाने से तुम मर जाओगे।" (त्रयोदश समुल्लास)

(समीक्षक) अब देखिये! ईसाइयों के ईश्वर की लीला कि प्रथम तो सरः का पक्षपात करके हाजिरः को वहां से निकलवा दी और चिल्ला-चिल्ला रोई हाजिरः और शब्द सुना लड़के का। यह कैसी अद्भुत बात है? यह ऐसा हुआ होगा कि ईश्वर को भ्रम हुआ होगा कि यह बालक ही रोता है। भला यह ईश्वर और ईश्वर की पुस्तक की बात कभी हो सकती है? विना साधारण मनुष्य के वचन के इस पुस्तक में थोड़ी सी बात सत्य के सब असार भरा है।।२५।। (त्रयोदश समुल्लास)

"खुदा ने शैतान से पूछा कहा कि मैंने उस को अपने दोनों हाथों से बनाया, तू अभिमान मत कर। इस से सिद्ध होता है कि कुरान का खुदा दो हाथ वाला मनुष्य था। इसलिए वह व्यापक वा सर्वशक्तिमान् कभी नहीं हो सकता। और शैतान ने सत्य कहा कि मैं आदम से उत्तम हूँ, इस पर खुदा ने गुस्सा क्यों किया? क्या आसमान ही में खुदा का घर है; पृथिवी में नहीं? तो काबे को खुदा का घर प्रथम क्यों लिखा? (१३५)" (चतुर्दश समुल्लास)

उपरोक्त शंकाए भी सत्यार्थ प्रकाश से ही उद्धृत हैं जिनमे ऋषि ने सत्य बात को सत्य ही कहा क्योंकि बाइबिल और क़ुरान में शैतान ने सच बोला जिसे ऋषि ने भी सत्य माना, मगर क़ुरानी खुदा और बाइबिल का यहोवा झूठ बोले ऐसा क्यों ?

क्या सतीश चंद गुप्ता जी अब बताने का कष्ट करेंगे की ऋषि ने जो सत्य का मंडन किया उसपर तो आपने समीक्षा की समीक्षा बिनवजह कर डाली मगर जो क़ुरानी खुदा ने झूठ का प्रचार किया आदम और हव्वा से उसपर आपकी चुप्पी क्या पूर्वाग्रह से ग्रसित है अथवा मत सम्प्रदाय की असत्य बात को भी सच मान लेने से आप इस पर समीक्षा न करोगे ?

लेख लिखने को तो बहुत बड़ा हो जावेगा मगर अभी के लिए केवल इतना ही लिखते हैं इस से पाठकगण बहुत कुछ समझ और विचार लेंगे की सतीश चंद गुप्ता जी की सत्यार्थ प्रकाश पर समीक्षाएं कितनी वाजिब हैं और कितनी नहीं।

आइये लौटिए वेदो की और।

नमस्ते
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